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Thursday, June 24, 2021

लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतें और उनमें सरकारी दफ्तर

समय के साथ लखनऊ ने बहुत से बदलावों को देखा है. लेकिन एक चीज़ जो न बदली वो है लखनऊ की इमारतें. लखनऊ वैसे तो राम कालीन शहर है लेकिन यहाँ का स्थापत्य नवाबी काल का ही है. नवाबी काल में नवाबो और अंग्रेजों ने लखनऊ में कई सिग्नेचर बिल्डिंग्स का निर्माण करवाया. आज़ादी के बाद सरकार ने इन इमारतों में अपने दफ्तर खोल दिए. आज कुछ को बेहतर रख रखाव के लिए ASI के सिपुर्द किया जा चुका है जबकि कुछ में अभी भी दफ्तर चल रहे हैं. आइये आज एक सैर ऐसी ही कुछ इमारतों की जो एक वक़्त लखनऊ की सरज़मीं से आसमान को बड़े गर्व से निहारा करती थीं और इतराती थीं अपने खूबसूरत नैन नक्श पर.

ये ईमारत अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में जानी जाती है. इस ईमारत को आप लोग ज़रूर पहचानते होंगे. जी हाँ आज की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और कल का मच्छी भवन. हालाँकि 1857 के प्रथम विद्रोह में यह लगभग नष्ट हो गया था. साल 1590 में इसका निर्माण अवध के शासक शेख अब्दुर्रहीम ने करवाया था. जिसे बाद में नवाब सफदरजंग ने पुराने भवन की दीवार की मरम्मत करवाकर मजबूती देकर फिर से इसका नाम मच्छी भवन रखा. 1857 की ग़दर में यहाँ रखा गोला बारूद क्रांतिकारियों के हाथ न लगे इसलिए अँगरेज़ कमांडर ने उसे आग लगाकर उड़ा दिया था जिसमे मच्छी भवन नष्ट हो गया था.

इस ईमारत का लोकप्रिय नाम है छतर मंजिल. जिसमे कुछ साल पहले तक सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया CDRI का ऑफिस था. CDRI का काम दवाओं पर रिसर्च करना है. आज यह एक संरक्षित ईमारत है. इस छतर मंजिल को कोठी फरहत बख्श और अम्ब्रेला पैलेस भी कहते हैं. इसे 1781 में जनरल क्लाउड मार्टिन ने बनवाया था जिसे बाद में नवाब सआदत अली खान ने खरीद लिया था, और इसके बाद  नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इसमें बाकी निर्माण करवाया. इधर खुदाई में इसमें तमाम सुरंगे मिलीं जो सीधे गोमती नदी से जुड़ती हैं. ये सुरंगे शायद कोठी को ठंडा रखती होंगी.

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ये लाल बरदारी है जिसमे अब राज्य ललित कला अकादमी का दफ्तर है. ये भी केसरबाग में है. इसका निर्माण सआदत अली खां ने सन 1798-1814 के बीच करवाया था. इसे कस्र उल सुलतान के नाम से भी जाना जाता है. इसका इस्तेमाल शाही दरबार या राज्याभिषेक के उत्सवों के लिए किया जाता था. अवध की अमीरी और अंग्रेजों के लूटने का आलम ये कि इसमें चालीस मन चांदी (एक मन बराबर चालीस किलो) का रत्नजड़ित सिंहासन था. अँगरेज़ उसे तो लन्दन ले गए और यहाँ नवाब साहब को लकड़ी की नक्काशीदार कुर्सी दे गए कि इस पर बैठ कर आप जंचते है.

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इस ईमारत में अब आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया यानी ASI का दफ्तर था. यह है कैसरबाग में स्थित कोठी रोशनउद्दौला. इसका निर्माण आज से करीब 200 साल पहले अवध के दुसरे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के वज़ीर रोशनुद्दौला द्वारा करवाया गया था. जिसे बाद में वाज़िद अली शाह ने अपनी बेगम का महल बना दिया था.

200 साल पुरानी इस ईमारत में अब उत्तर प्रदेश के महामहीम राज्यपाल रहते हैं. YH HAI कोठी हयात बख्श. हयात बक्श मतलब ज़िन्दगी देने वाली. अब यह राज भवन है. इसका भी निर्माण जनरल क्लाउड मार्टिन ने ही करवाया था. जब मेजर जॉनशोर बैंक अवध के कमिश्नर बने तब वे यहीं रहते थे जिस वजह से कुछ वक्त तक इसे बैंक कोठी भी कहा गया. वर्तमान में यहाँ से हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के सर्वेसर्वा विराजते हैं. यानी महामहिम राज्यपाल.
ईमारत में अब भारतीय स्टेट बैंक की मुख्य शाखा का दफ्तर है. तारे वाली कोठी कहते हैं इसे जो कि के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम के ठीक पीछे बनी हुई है. इसका निर्माण सन 1831 में नवाब नसीर-उद-दीन हैदर ने शाही प्लेनेटोरियम  के वास्ते स्पेस स्टडी के लिए करवाया था. उनका यह भी मानना था कि इससे युवा दरबारियों को अन्तरिक्ष के बारे में जानकारी मिलेगी. हालाँकि इसका पूरा निर्माण नसीर उद दीन हैदर की ज़िन्दगी में न हो सका और हैदर के चाचा ने करीब 19 लाख रूपए खर्च करते हुए 1841 में इसे पूरा करवाया. यह भव्य ईमारत आज बैंक के कामकाज से गुलज़ार है.

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इस ऐतिहासिक ईमारत को हम लखनऊ जीपीओ के नाम से जानते हैं. आज़ादी से पहले यह अंग्रेजों का रिंग थिएटर था. जहाँ ब्रिटिश परिवार मनोरंजन के लिए आते थे. यहाँ इंग्लिश नाटक भी खेले जाते थे. इस कैंपस में एक क्लॉक टावर भी है जिसके घंटे की आवाज़ दूर तक जाती है. इस ईमारत के मेन गेट पर लिखा था कि DOGS AND INDIANS ARE NOT ALLOWED. सुप्रसिद्ध काकोरी ट्रेन डकैती के नामजद क्रांतिकारियों पर मुक़दमे की कार्यवाही के लिए इसे कोर्ट रूम में तब्दील कर दिया गया था.

से यहाँ से बड़े बड़े संगीतकार संगीत सीखकर निकले हैं. जी हाँ ये है भातखंडे म्यूजिक डीम्ड युनिवेर्सिटी. वाज़िद अली शाह की बनवाई इस ईमारत को  परीखाना कहते थे. ये कैसरबाग में सफ़ेद बरदारी के ठीक बगल में है. यहाँ लड़कियों को नृत्य संगीत की शिक्षा दी जाती थी. लड़कियां मतलब वाजिद अली शाह की परियां. लेकिन 1926 में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे, राय उमानाथ बली और राय राजेश्वर बली की कोशिशों से यहाँ एक संगीत विद्यालय की स्थापना की गयी. जिसका उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर सर विलियम मैरिस ने किया था इसलिए उन्ही के नाम पर इसे मैरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक कहा जाने लगा लेकिन २६ मार्च १९६६ में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका नाम भातखंडे हिन्दुस्तानी संगीत विद्यालय कर दिया.
इस ईमारत से उत्तर प्रदेश की सरकार चलती है जी हाँ ये हैं विधान भवन. जहाँ प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत लगती है. इसका निर्माण १९२२ में सर हरकोर्ट बटलर ने शुरू करवाया था. पहले यह अँगरेज़ सरकार का काउंसिल हाउस था जहाँ से आगरा अवध यूनाइटेड प्रोविंस की सरकार चलायी जाती थी और अब उत्तर प्रदेश की.

चंद खामोशियाँ मेरे हिस्से लिख कर,

वो चली गयी मेरी पेशानी पर एक किस्सा लिख कर...

आपके रिव्युज़ का इंतज़ार रहेगा..

आप इसे हमारे YouTube Channel "One Mile One Story" पर भी देख और सुन सकते हैं| इंतज़ार रहेगा..आपका

Monday, November 2, 2020

Gates of Lucknow (लखनऊ के दरवाज़े)

नमस्ते दोस्तों, 

हम फिर हाज़िर है लखनऊ के बारे में एक नया रोमांचक एपिसोड लेकर. दरवाज़े घर ही नहीं बल्कि शहर की भी शान होते हैं क्योंकि ये शहर की भव्यता का प्रतीक होते हैं. अवध की नयी राजधानी दिल्ली से कम नहीं थी. लखनऊ में भव्य दरवाज़ों का इतिहास रहा है हम यहाँ कोशिश करेंगे कि आपको लखनऊ के प्रमुख दरवाज़ों से रूबरू करवाया जाए. आइये मेरे साथ खटखटाते हैं लखनऊ के दरवाज़ों को.  

लखनऊ के नक्खास क्षेत्र में बना ये दरवाज़ा अकबरी दरवाज़ा कहलाता है. अकबर की ताजपोशी के बाद लखनऊ में उसके नाम से एक दरवाज़ा बनवाया गया. जिसे अकबरी दरवाज़ा कहा गया. अकबरी दरवाज़ा दिल्ल में शहंशाह अकबर की ताजपोशी के दौरान बनवाया गया था. सन् 1528 में बाबर ने लखनऊ को अपनी हुकूमत में ले लिया था, जबकि इससे पहले शर्की राज्य जौनपुर के शासक लखनऊ पर अपनी सल्तनत का सिक्का जमाए हुए थे. मुगल बादशाह हुमायूं के बाद शेरशाह सूरी ने लखनऊ को अपने अधिकार में लिया और एक टकसाल अकबरी दरवाजे के भीतर कायम की. अकबर के बादशाह बनने के बाद लखनऊ का भाग्य चमका. लखौरी ईंट से बना यह दरवाज़ा ईरानी शैली का बना है हालाँकि जिसका कोई वास्तु सौंदर्य नहीं है बस यह लखनऊ में मुगलिया सल्तनत का एकमात्र गवाह भर है. कहते हैं कि गुनाहगार का सिर कलम कर धड़ इस दरवाज़े पर लटका दिया जाता था और सिर पास ही नाले में फेंक दिया जाता था. इस वजह से यह नाला भी "सिर कटा नाला" के नाम से जाना गया.

    अकबरी दरवाज़े के दूसरे छोर पर बना है गोल दरवाज़ा. जिसका निर्माण वजीर बेगम ने करवाया था. अकबरी गेट और गोल गेट के बीच कभी हुस्न का बाज़ार सजता था. आज यहाँ सर्राफा है. सोने चांदी के भव्य शो रूम्स हैं. इसके अन्दर की गलियों से ठक-ठक की आवाज़ आने का मतलब यहाँ चांदी का वर्क कूटा जा रहा है. यहाँ कभी लखनवी तमीज और तहजीब का बोलबाला था. इस बाजार में गोटे-किनारी की तमाम दुकानें हैं, अत्तारों की दुकानें हैं, इस तरह यहां सोने-चांदी की चमक-दमक, चिकन के कारखाने, फूलों की मंडी, जरी-कामदानी के कारीगर और गाने-बजाने नाचने वालों के घराने एक साथ मिलते हैं.

       रूमी दरवाज़े जैसी भव्यता का कोई दूसरा दरवाज़ा पूरे भारत में नहीं है. जो कि बड़े और छोटे इमामबाड़े के बीचोबीच हरदोई रोड पर स्थित है. जानकारों का मानना है कि इसे नवाब आसफुद्दौला ने अवध में भीषण अकाल के दौरान 1784-86 में बनवाया था. इसे इंडोपर्शियन शैली में बनवाया गया है. हालाँकि वरिष्ठ इतिहासकार पी.एन. ओक इसे लक्षमणपुरी का "राम दरवाज़ा" बताते हैं. जिसे नवाबो ने रूमी नाम दिया. रूमी दरवाज़े के टॉप पर बनी बुर्ज़ी से गोमती का नज़ारा बहुत ही अद्भुत दिखता था. हम तो खूब चढ़े हैं इस पर. अब सरकार ने रख-रखाव और खतरे को देखते हुए इसे बंद कर दिया है.

चौलाखी या लाखी दरवाज़ा जिसे चाइना बाज़ार दरवाज़ा भी कहा गया. यह दरवाज़ा कैसर बाग़ की चौलक्खी कोठी में बना हुआ है. यह केसरबाग महल का पूर्वी दरवाज़ा भी है. जिसका निर्माण 1848-1850 के नवाब मध्य वाजिद अली शाह ने करवाया.  परीखाना नवाब वाजिद अली शाह का की रानियों का हरम था. लाखी दरवाज़ा इस दरवाज़े के ठीक सामने बना हुआ है. ये दोनों दरवाज़े जुड़वाँ हैं. दोनों का निर्माण एकसाथ किया गया. लाखी दरवाज़ा केसरबाग में सफ़ेद बरदारी के ठीक पीछे बना हुआ है. ये दरवाज़ा गवाही है कि इसी के नीचे से गुज़रते हुए नवाब वाज़िद अली शाह को कलकत्ते ले जाया गया. जहाँ के विलियम फोर्ट से वे कभी वापस लखनऊ न आ सके.

नसीरुद्दीन हैदर के बनवाए इस दरवाज़े को केसरिया फाटक कहते हैं. ये लखनऊ के ग्लोब पार्क के दक्षिण में बना हुआ है. अब यह उपेक्षित है जबकि इससे 1857 की क्रांति की यादें भी जुडी हैं. इसका एक नाम नाम शेर दरवाज़ा भी है. 1857 के विद्रोह में  एक अंग्रेज़ ब्रिगेडियर जनरल नील को यहाँ मार दिया था जिसके बाद इसे इसे नील गेट भी कहा जाने लगा. शेर दरवाज़ा आज भी शेर दरवाज़ा है क्‍योंकि सिंहद्वार पर बने ये शेर हिंदुस्तानी सपूतों की दास्तान से जुड़े हैं जिन्होंने गदर में अपनी बहादुरी के कमाल दिखाए. 26 सितम्बर 1857 को मद्रास रेजीमेंट का जनरल नील जब मोती महल से रेसीड़ेंसी की तरफ जा रहा था, एक ‌हिंदुस्तानी ने उस पर बंदूक से वार कर दिया. जनरल नील उसी जगह गिर गया. मरने के बाद उसे बेली गारद के अहाते में दफना दिया गया था.

     लखनऊ के आलमबाग एरिया में है चंदर नगर गेट. इसे फांसी दरवाज़ा भी कहते हैं. क्योंकि यहाँ आज़ादी के मतवालों को फांसी दी जाती थी. कभी यहाँ चारों ओर बाग़ थे भंवरे थे और खुशबू थी. इस दरवाज़े को 1847-56 में तब बनवाया गया जब नवाब वाजिद अली शाह अपनी रानी आलम आरा (आज़म बहु) के लिए यहाँ एक महल बनवा रहे थे. इस महल के आर्किटेक्ट छोटे खान थे. लेकिन बाद में यह कोठी आजादी की लड़ाइयों में उजड़ गई. चंदर नगर गेट का अपना एक गौरवशाली अतीत है. यह आजादी की लड़ाई का एक अहम हिस्सा भी रहा है. जब विद्रोहियों ने रेजीडेंसी को सीज कर दिया तब अंग्रेज आलमबाग के रास्ते शहर में प्रवेश कर रहे थे. यहां मौलवी अहमद उल्लाह शाह और अंग्रेजों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. बताते हैं सर हेनरी हैवलॉक यहीं बीमार हुए थे, जिनकी मौत बाद में दिलकुशा में हुई थी. मौत के बाद उन्हें दिलकुशा के करीब स्थित कब्रिस्तान में दफन किया गया था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अंतिम पड़ाव में अंग्रेजों ने इसी फाटक को किले के रूप में प्रयोग किया और कई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई.

     छली दरवाज़ा अब इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय में स्थित है. एक ज़माने में यह बादशाह बाग़ का एंट्री गेट था. इसकी सीध में पड़ती है लाल बारादरी. जहाँ नवाब रुकते थे और फिर गोमती की ओर चले जाते थे. गोमती पार कर वे छतर मंज़िल में जाते थे या आते थे. अपने महल में घूमने के बाद वे  लौटते समय अमरूदों के बागों की ओर अलीगंज निकल जाते थे. दरअसल यह बादशाह बाग़ का दरवाज़ा था. बादशाह बाग़ जिसे बाद में महाराजा कपूरथला ने अंग्रेजों से खरीद लिया था. आज इसी बादशाह बाग़ में पिछले सौ सालों से लखनऊ विश्वविद्यालय है.  

जब भी आना लखनऊ तो खटका देना मुझे, 
जर्जर ही सही लेकिन दरवाज़ा हूँ मैं,
#rohittherainbow
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Lucknow in the first war of independence 1857 (1857 की ग़दर में लखनऊ)

अक्सर लोग इस वहम में रहते हैं कि लखनऊ महज़ रंगीनियत का नाम है. यहाँ सिर्फ शराब, शबाब, नवाब और कबाब के ही चर्चें हैं जबकि ऐसा नहीं है. लखनऊ ने वक़्त आने पर बड़े से बड़ा बलिदान भी दिया है. बात 1857 के दौर की है जब भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी के ज़ुल्मों से समूची मानवता त्राहि त्राहि कर रही थी. ऐसे में जब मेरठ में भारतीय सैनिकों को गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस दिए गये तो उनमे रोष फ़ैल गया. वे विद्रोह पर आमादा हो गए.  हालांकि दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में अंग्रेजों से भारत की आज़ादी के लिए योजना तैयार कर ली गयी थी. अवध में जिसका नेतृत्व नवाब वाजिद अली शाह की बीवी 'बेगम हज़रत महल' के हाथ में था. आखिरकार 10 मई 1857 को मेरठ से विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी. अवध की बेगम हज़रत महल एक मंझी हुई नेता के अलावा वीर योद्धा भी थीं. उन्होंने लखनऊ में विद्रोह की कमान सम्हाल ली. इस वक़्त वे अकेली थीं क्योंकि बादशाह वाजिद अली शाह को अँगरेज़ गिरफ्तार कर कलकत्ता के मटिया बुर्ज में कैद कर चुके थे. लखनऊ इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण था कि कंपनी के सामने अँगरेज़ अधिकारीयों ने अफगानिस्तान युद्ध से भी बड़ी संख्या में सैनिकों की मांग अवध में लड़ाई के लिए रखी थी.

आज चिनहट लखनऊ का एक दूरस्थ इलाका है लेकिन 30 जून 1857 को लखनऊ में चिनहट की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. चिनहट ने इस दिन इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवा लिया था. यहाँ विद्रोहियों ने लगभग 200 अँगरेज़ सैनिकों को मार गिराया और 5 तोपें उनके कब्ज़े में आयीं. चिनहट में बर्तानिया सैनिकों को धुल चटाने के बाद उत्साहित विद्रोही केसरबाग स्थित रेसीडेंसी आ गए. इस रेजीडेंसी की दीवारें 1857 के विद्रोह को कभी न भूल पाएंगी. इसी बेली गार्ड या बेली गारद में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. उन्होंने लगभग 600 अंग्रेजों को यहाँ बंधक बनाकर रखा और अंग्रेज बच न पायें इसलिए बाहर  से गोलियां और गोले बरसाते रहे. रेसीडेंसी आज भी लखनऊ में 1857 की ग़दर का के उन गवाहों में से एक है जो जिंदा हैं. ये याद दिलाता है कि किस तरह बागियों ने भारत की आज़ादी की नींव रखी.

16 नवम्बर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. यहाँ वीरांगना ऊदा देवी बड़े साहस और दिलेरी से लड़ी. वे नवाब की सेना के महिला दस्ते में थीं. उन्होंने मरदाना वेश बनाकर और यहीं एक पेड़ पर चढ़कर 32 अँगरेज़ सिपाहियों को मार गिराया. अँगरेज़ उनसे इतना भयभीत हो गए कि महल में घुसते समय उन्होंने उनका पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. दिलकुशा कोठी कभी नवाबों और अंग्रेजों की आरामगाह थी लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद इसको क्रांतिकारियों ने अपना ठिकाना बना लिया था. लेकिन जैसे जैसे विद्रोह दबता गया वैसे अँगरेज़ हावी होते गए और एक दिन उन्होंने इस कोठी पर भारी गोला बारूद बरसा कर विद्रोहियों को मार कर इस पर कब्ज़ा कर लिया.

1857 की ग़दर में बेगम हज़रत महल ने आज़ादी की लड़ाई अवध के एक किले मूसा बाग़ में लड़ी थी. यहाँ आलमबाग को जीतकर अंग्रेजों ने धावा बोल दिया था. लेकिन यहं अँगरेज़ कैप्टेन वेल्स को मार दिया गया था जिसकी मजार यही पर है. और अब लोग उस पर सिगरेट का चढ़ावा चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं. बेगम हज़रत महल लड़ी पुरजोर लड़ी लेकिन आखिर में पस्त हो गयीं और अपने बचे खुचे सिपाहियों के साथ नेपाल में शरण ली. अवध पर दुबारा कब्ज़ा करने के लिए कंपनी को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ा था और यही एक आखिरी रियासत थी जिसे उन्होंने सबसे आखिर में दुबारा हासिल किया था. अवध में विद्रोह का नेतृत्व करने वाली बेगम हज़रत महल की कब्र पडोसी मुल्क नेपाल में ही है. लेकिन वहां उनकी शहादत पर मेला नहीं लगता. जबकि मैंने सुना था कि
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा,

आपकी प्रतिक्रियायों का इंतजार रहेगा.

#rohittherainbow 

Friday, July 31, 2020

लखनऊ में प्रेमचंद्र

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र हिंदी साहित्य में ज़मीन से जुडी हुई कहानियाँ लिखने के महारथी थे. ऎसी अनेक कहानियां हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और लोगों की जुबान पर चढ़ी हुई हैं. मुंशी प्रेमचंद्र का नाता अवध की राजधानी लखनऊ से भी लम्बे समय तक रहा. आज 31 जुलाई मुंशी जी की जयंती है. आइये जानते हैं लखनऊ में वे कब तक और किन जगहों से जुड़े रहे. लखनऊ की मारवाड़ी गली, लाटूश रोड पर होमियोपैथी के डॉक्टर पाठक और डॉ. कृपा शंकर निगम का मकान ऐसी कई जगहें हैं जो उनसे सीधे सीधे जुडी हुई हैं. प्रेमचंद्र की जिंदगी और उनके साहित्य पर पिछले 28-30 वर्षों से शोध कर रहे डॉक्टर प्रदीप जैन बताते हैं कि यूं तो प्रेमचंद्र जी कई शहरों में रहे पर लखनऊ से उन्हें खास लगाव रहा. मुंशी प्रेमचंद्र ने 1921 में सरकारी नौकरी छोड़कर लखनऊ आ गए. जहां उन्होंने दो बार नौकरी की. पहली ‘गंगा पुस्तक माला’ में 100 रुपये महीने की तनख्वाह पर बतौर साहित्यिक सलाहकार तथा दूसरी मुंशी नवल किशोर प्रेस की मैगजीन माधुरी में बतौर संपादक. गंगा पुस्तक माला के दुलारे लाल भार्गव के आग्रह पर ‘रंगभूमि’ का प्रकाशन गंगा पुस्तक माला  में करवाया. जिसमे रायल्टी के तौर पर मुंशी जी को 1,800 रुपए मिले. इस कालजयी किताब का पहला प्रिंट आर्डर ही 5000 कॉपी का था. इसी दौरान सितंबर 1924 में वे लाटूश रोड़ पर किराए के माकन में रहे. नवंबर में वहीं नाटक ‘करबला’ लिखा जिसने उस वक्त खूब ख्याति कमाई. अगस्त 25 में दुलारे राम मनभेद के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
मुंशी नवल किशोर प्रेस उन दिनों एक जाना माना प्रेस था. उनकी मैगजीन ‘माधुरी’ के संपादक के तौर पर नौकरी कर ली. जिसमे माधुरी की प्रिंट लाइन में उनका नाम पंडित कृष्ण बिहारी के साथ संयुक्त रूप से जाता था. इस दौरान वे अमीनाबाद के झंडे वाला पार्क के पास व गनेशगंज में रहे. फरवरी 1931 में ‘माधुरी’ के संपादन को उन्होंने छोड़ दिया. पर वे लखनऊ में बने रहे. वे वाराणसी के साप्ताहिक अखबार ‘जागरण’ को लखनऊ से रोजाना निकालने की योजना में लग गए. हालांकि स्वास्थ्य के कारण उनकी यह योजना सफल न हो पायी.  
रिफाह ए आम क्लब
10 अप्रैल 1936 को लखनऊ के रफे आम क्लब में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता भी उन्होंने की. दो दिन पहले ही इसके लिए वे यहां आ गए. सज्जाद जहीर के मकान ‘वजीर मंजिल’ पर वे जैनेंद्र कुमार के साथ रुके. उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था. 25 जून 1935 को उन्हें खून की पहली उल्टी हुई, उसके ठीक एक महीने बाद 25 जुलाई को दूसरी. जिससे बाद से वे और ज्यादा बीमार रहने लगे. इलाज के लिए वे लखनऊ आ गए. शुरुआती दो महीने लाटूश रोड पर कृपा शंकर निगम के मकान और फिर अमीनाबाद के सूर्य होटल में ठहरे.
वरिष्ठ साहित्यकार व लेखक रामकृष्ण जी लिखते हैं ‘आज भी वर्ष 1927 की एक डायरी के 29 नवंबर के पृष्ठ पर अंकित मिलता है कि, बच्चे  (मतलब रामकृष्ण जी) के पैदा होने पर बाबू प्रेमचंद्र ने दस रुपये उस पर न्यौछावर किये. प्रेमचंद्र जी उन दिनों लखनऊ में ही रहते थे. हमारे अपने घर के बाहरी हिस्से में एक किराएदार के रूप में. तब वे मुंशी नवल किशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित होने वाली माधुरी नामक पत्रिका का संपादन कर रहे थे. अपने उपन्यास रंगभूमि का लेखन उन्होंने हमारे घर में रहते हुए ही किया था.’
(साभार: अमर उजाला ३० जुलाई २०१३)

Sunday, April 26, 2020

मेरी चीन यात्रा - 3 (खूबसूरत कुनमिंग शहर)


अगले दिन हमें अकेडमिक टूर पर जाना था. मैं सुबह जल्दी ही उठ गया था. सुबह जल्दी ही हो जाती है 4-4.30 बजे वहां सूर्योदय हो जाता था. सूरज की लाल किरने मेरे बिस्तर पर सुबह सवेरे ही अठखेलियाँ करने लगती थी. मेरी नींद टूटी मैंने खिड़की का पर्दा हटाकर नीचे देखा तो लोग बाग़ सड़क किनारे चीनी योगा कर रहे थे. इसे मैंने चीनी योग नाम इसलिए दिया क्योंकि भारतीय योग की ही तरह उनकी अपनी कुछ विशिष्ट शैलियाँ थीं. बीच में एक बुजुर्गवार खड़े होकर सबको बता रहे थे और लोग उनके चारों ओर गोल घेरे में खड़े होकर उनके दिशा निर्देश फॉलो कर रहे थे. सब कुछ एक रिदिम में लग रहा था. मैंने तो ऐसा सिर्फ हॉलीवुड की फिल्मों में ही देखा था. एक सबसे अच्छी बात यह थी कि जब यह योगाभ्यास किया जा रहा था तब एक ट्राफिक पुलिस ट्राफिक को डाइवर्ट कर रहा था मतलब योग करने वालों को पूरी छूट थी सड़क का इस्तेमाल करने की. शायद ऐसा इसलिए भी आसपास कोई पार्क न रहा हो तो सरकार ने ही ऐसे दिशा निर्देश दिए हों. सुबह सुबह ये सब देखकर मन बड़ा प्रसन्न हो गया कि हमारे पडोसी मुल्क में भी लोग अपनी परम्पराओं से जुड़े हुए हैं. परम्पराओं से जुड़ कर ही हम आगे जा सकते हैं. हाँ एक व्यावसायिक समाज कार्यकर्ता और समाज विज्ञानी होने के नाते रूढ़ियों को मानने के पक्ष में कभी नहीं रहा. लेकिन योग तो हमारे जीवन का एक हिस्सा है जो ज़रूरी तौर पर अपनाना चाहिए.
खैर ये सब देखकर मैं अभीभूत हो गया. थोड़ी देर तक उन्हें देखता रहा फिर बाथरूम चला गया क्योंकि जल्दी ही फ्रेश होकर निकलना जो था. आज हमें चाइनीज़ गाँव और कुछेक कबीलों के पास जाना था. ये सब हमारे अकेडमिक टूर का हिस्सा था. मैं उत्साहित तो बहुत था. क्योंकि इसके पहले कभी मंगोल कबीलों से मिला नहीं था सिर्फ किताबों में ही पढ़ रखा था. हमारे होटल से युन्नान युनिवेर्सिटी कोई दो या ढाई किलोमीटर होगी तो हम लोग पैदल ही चल दिए. पैदल चलने के कई फायदे हैं वे तब बढ़ जाते हैं जब आप विदेश भ्रमण पर हों. आप चारों ओर देख सकते हैं वहां की आबोहवा महसूस कर सकते हैं और सबसे बड़ी बात वहां के स्थानीय नागरिकों से इंटरएक्शन किया जा सकता है जो कि हमने किया. मी-हाउ बोलने वाले चीनी हम भारतीयों को देखकर हाय-हेलो बोलने लगे, हा हा हा. कुनमिंग शहर एक अत्यंत रमणीक और साफ़ सुथरा नगर है. लोग अनुशासन में रहना पसंद करते हैं. हम भारतियों की तरह नहीं कि जहाँ जगह मिले खुद को ठूंस लो बाकी निकल तो आप जायेंगे ही. चौड़े-चौड़े फूटपाथ थे. पैदल चलने वाले लोग सड़क पर नहीं चल रहे थे. शहर हरा भरा था. चूँकि जुलाई थी तो वहां भी बारिश का मौसम था हिमालय से नज़दीक होने की वजह से थोड़ी ठण्ड भी हो गयी थी. मुझे अफ़सोस हुआ कि मैं अपनी जैकेट होटल में ही क्यों छोड़ आया. मैंने कईं लोगों को इलेक्ट्रिक स्कूटर पर देखा. जगह-जगह उनके लिए चार्जर लगे हुए थे. भारत में तब "यो बाइक्स" आई थीं लेकिन बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं हुई थीं क्योंकि हम भारतीयों को कम माइलेज की भारी मोटरसाइकिल चलाना ज्यादा पसंद है न कि हलकी किफायती बाइक्स. इस शहर में तो इलेक्ट्रॉनिक बाइक्स ही नज़र आ रही थीं.



टहलते-टहलते अब तक हम लोग युन्नान यूनिवर्सिटी आ चुके थे. सड़क पर लम्बी लम्बी लक्सरी बसेस खड़ी हुई थी. एक बस में हम लोग जाकर बैठ गए उसमे कुछ दक्षिण भारतीय प्रोफेसर्स पहले से ही बैठे हुए थे हम उन्ही के पास अपना परिचय देकर बैठ गए और थोड़ी देर में वार्तालाप का दौर आगे बढ़ने लगा. मेरे ग्रुप के लोग इंग्लिश में बात कर रहे थे. अगली सीट पर बैठी एक महिला प्रोफ़ेसर जो कि बड़ी देर से हमें सुन रही थीं. अपनी सीट से उठीं हम तक आयीं और इंग्लिश में बोली कि यू आल आर लुकिंग इंडियन्स, इफ यू आर इंडियंस देन यू शुड टॉक इन हिंदी... ऐज़ वी आर फ्रॉम स्पेन एंड वी आर टॉकिंग इन आवर लैंग्वेज.. हम लोग अचंभित थे. वे हमें डांट रही थीं या मातृभाषा के प्रति हमें प्रेम सिखा रही थीं. हम लोग अभी भी उत्तर और दक्षिण भारतीय होने में ही उलझे हुए थे. हम जब तक समझते तब तक बस में गाइड आ चुकी थीं. जो इंग्लिश और मंदारिन में हमारा वेलकम कर रही थीं. गाइड की सुविधा होने से हमें बड़ी राहत मिली. गाइडिंग का काम कोई और नहीं बल्कि युनार्सिटी के छात्र/छात्राएं ही कर रहे थे. यहाँ भी अभिनव प्रयोग. किसी प्रोफेशनल गाइड को रखने के बजाय विद्यार्थियों को रखना समझदारी से भरा निर्णय ही कहा जायेगा.
आपकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।


Monday, January 14, 2019

मेरी चीन यात्रा - 2 (खूबसूरत युन्नान युनिवर्सिटी)


भोर का सूरज मेरी खिड़की से साफ़ दिख रहा था. अरुणिमा पूरब में अपना प्रकाश धीरे धीरे फैला रही थी. समय कोई 5 बजकर 30 मिनट होने वाला होगा. मैंने सोचा लाओ इसे कैमरे में कैद कर लूँ. इधर उधर कैमरा देखा लेकिन नहीं दिखा फिर ध्यान आया कि वह तो हैंडबैग के साथ ऊपर रखा हुआ था. मैंने भी समय न गवांते हुए इस अद्भुत क्षण को अपनी आँखों में कैद करने की कोशिश की और मेरी कोशिश रंग लाई. अहा... कभी न भूलने वाला दृश्य था वह, शायद इसे ही नयनाभिराम कहते हैं. भारत हो या चीन पूरब हो या पच्छिम सूर्योदय और सूर्यास्त सब एक ही जैसे होते हैं. कहीं कोई अंतर नहीं फिर धरती पर खिंची लाइनों के लिए लोग लड़ते क्यों हैं. मैं यही सब सोच रहा था कि कुनमिंग एअरपोर्ट पर फ्लाईट की लैंडिंग की उद्घोषणा होने लगी. उद्घोषणा सुनकर मेरी त्रन्दा टूटी. सीट बेल्ट बाँधने के लिए ढूँढने लगा. मन में फिर से वही उमंग कि अब शीघ्र ही चीन की धरती देखने को मिलेगी. एक और चीनी धरती देखने की उमंग तो दूसरी और यह डर कि चीनी हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे. क्योंकि अभी तक जैसा फिल्मों में देखा सुना उसमे तो चीनियों को एकदम नेगेटिव ही दिखाया भले हमारा उनका ट्रेड कितना ही क्यों न हो. फिर सोचा चलो जो होगा देखा जायेगा.
जल्दी ही हमारी फ्लाईट कुनमिंग एअरपोर्ट पर लैंड कर गयी. एक बड़ी और सुन्दर सी बस हमें लेने आई. एयरपोर्ट पर हम सब इमिग्रेशन की लाइन में लग गए. मेरे पीछे कई और लोग  भी थे. काउंटर पर बैठी महिला ने सबसे पहले मुझसे “मी-हाउ” कहा. मंदारिन में जिसका मतलब नमस्ते होता है, मैंने भी उनसे हेल्लो कहा. इस पर उन्होंने आने का परपस पूछा तो मैंने कहा कि कांफेरेंस, मेरे कांफेरेंस कहने पर उन्होंने मुझसे इनविटेशन लेटर माँगा जो कि मैंने हाथ में निकालकर रखा हुआ था मैंने तुरंत उसे प्रस्तुत किया. संतुष्ट होने पर उन्होंने चीन आने पर फिर से मेरा स्वागत किया और कांफेरेंस में सफल होने की शुभकामनायें भी दीं. मैंने भी थैंक यू कहा और आगे बढ़ गया. यहाँ से मुझे लगने लगा कि चीन का ये भ्रमण अच्छा होने वाला है क्योंकि अभी तक जितने भी लोग मिले सभी अदब तहजीब से मिल रहे थे. एअरपोर्ट पर ही कांफेरेंस प्रतिनिधि के रूप में कुछ छात्र काउंटर लगाए बैठे हुए थे हम लोग सीधे उनके पास गए उन्हें अपना इनविटेशन लैटर और होटल का रिजर्वेशन दिखाया. तुरंत हमारे लिए टैक्सी का इंतजाम हुआ और हम लोग सकुशल एक थ्री स्टार होटल आ गए. इस समय मुझे उसका नाम याद नहीं आ रहा हैं. लेकिन होटल था बहुत आलीशान. एअरपोर्ट से लेकर होटल तक सड़कें साफ़ सुथरी थीं. सब लोग ट्राफिक नियमों का पालन करते हुए दिख रहे थे. कोई आपाधापी नहीं जबकि चीन की आबादी हमसे ज्यादा है. लेकिन लोग किसी जल्दी में नहीं दिखे. हमारा लखनऊ होता तो सड़कों पर बलगम व मसाला युक्त लाल थूक और लोग एक दुसरे के ऊपर चढ़कर निकलने को बेताब होते. कोलकाता में बदलवाई गयी करेंसी यहाँ काम आ रही थी. थोड़ा कन्फ्यूज़न ज़रूर था लेकिन जल्दी ही करेंसी समझ आ गयी थी.
अपने आलिशान होटल पहुंचकर हम लोगों ने नहाया धोया और तैयार होकर चल दिए कांफेरेंस स्थल “युन्नान यूनिवर्सिटी”. होटल में भी हमारा खूब सत्कार हुआ. मैं भी सबसे मी-हाउ बोलने लगा. हमारे लिए होटल के बाहर बस इंतज़ार कर रही थी. पानी के लिए इधर उधर देख ही रहा था कि एक छात्र ने पानी की बोतल आगे बढ़ा दी. मैंने फिर खुश हुआ. इसके बाद होटल से ही पानी की कई बोतलें दे दी गयी थीं. यहीं से लगने लगा था कि आयोजकों ने इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के सफल होने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है. क्योंकि सुना था विदेशों में पानी बहुत महंगा मिलता है और यहाँ तो नदियाँ बह रही थी. हमारे लिए ख़ास इंतजामात थे. आगे पुलिस की एक जीप चल रही थी जो हमें एस्कॉर्ट कर रही थी. रास्ता हमारे लिए एकदम खाली था, पीछे और भी कई बसे थीं. यहाँ तो खाली रास्ता दिखे तो समझिये कि कोई नेता जी चले आ रहे हैं. युनिवर्सिटी के रास्ते पर जगह-जगह डेलीगेट्स के स्वागत के लिए बैनर्स लगाए गए थे. भारत में रैली या चुनाव के दौरान स्वागत सत्कार किया जाता है ऐसी ही परंपरा है. कहीं भी ट्राफिक जाम नहीं था लोगों को नियमों का पालन करते हुए देखकर बड़ा अच्छा लगा. हमारी बसों को देखकर लोग हाथ हिलाकर अभिवादन भी कर रहे थे. चीन आकर इस स्वागत से हम सब डेलिगेट्स अभीभूत थे. होते करते यूनिवर्सिटी भी आ गयी. हम सब उतर गए और सबसे पहले रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया. हमारा पैनल दो दिन चलने वाला था. खाने पीने की चिंता नहीं थी सब कुछ कांफेरेंस में ही था. चूँकि पहले दिन से ही हमारा पैनल था इसलिए सारा ध्यान उसी पर केन्द्रित था.
पहला दिन निपटाकर मैंने सोचा चलो पहले यूनिवर्सिटी घूमी जाए. मैंने बैग लिया और निकल पड़ा घूमने. एकड़ों में फैले परिसर में सब कुछ करीने से सजाया गया था. नए पुराने का कॉम्बिनेशन बहुत ही अच्छा दिखाई दे रहा था. रात को समूचा कैम्पस लाइट से जगमग हो रहा था. मैं वहीं फूटपाथ पर बैठ कर परिसर का आनंद ले रहा था कि एकाएक मुझे इंडो-चाइना वॉर याद आ गयी और "कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों..." गाना याद आ गया, जिससे मन थोडा व्यथित हुआ लेकिन जल्दी ही इस अवसाद से बाहर निकला और मैं आगे बढ़ा. गणित, दर्शन, इतिहास सभी विभाग बहुत ही बड़े-बड़े थे और पूरे परिसर में कांफेरेंस के विभिन्न सत्र ही चल रहे थे. एक विभाग में युन्नान यूनिवर्सिटी के मॉडल को सजाया गया था. जहाँ तमाम डेलिगेट्स अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे थे. मैंने भी खिंचवाई और आगे बढ़ गया. किताबों से विशेष लगाव है तो लाइब्रेरी की ओर मुखातिब हुआ. उसे देखकर मैं अवाक रह गया और मुंह खुला का खुला रह गया, पता किया कि इस लाइब्रेरी में 1 करोड़ से भी ज्यादा किताबें हैं. मैं दंग रह गया हमारे यहाँ तो इतनी क्या 10 लाख किताबो के बारे में भी नहीं सोचा जा सकता है. लाइब्रेरी के लिए फंड्स का रोना हर यूनिवर्सिटी में आम है. 
घूमने-घामने के बाद लगी भूख. मेरी कांफेरेंस किट में डिनर के कूपन्स थे जिन्हें लेकर मैं मेस चला गया. शानदार मेस थी वह. यहां मौजूद छात्रों को जो हमे अटेंड कर रहे थे, कूपन दिया और सीधे डाइनिंग हॉल में प्रवेश कर गया. वहां देखा डिनर की  दिव्य व्यवस्था थी. हाँ मन में डर और हिचक ज़रूर थी कि कीड़े-मकोड़े तो नहीं होंगे. क्योंकि मैं तो मांसाहारी भी नहीं हूँ जो पोर्क वगैरह खाकर काम चला लूँ. लेकिन वहां डाइनिंग टेबल पर वेज और नॉन वेज के स्लिप्स लगे हुए थे. फिर भी घासफूस वालों के लिए कुछ नहीं था. खोजबीन किया तो बॉयल्ड मूंगफली और ग्रीन एपल्स दिखे. मैंने झटपट बटोरे और जुट गया खाने में. कोल्डड्रिंक्स भी भरपूर था. जितने दिन रहा उतने दिन बॉयल्ड मूंगफली, एप्पल, ग्रेप्स और कोल्ड ड्रिंक्स से ही काम चलाया गया. अंडे को यहाँ वेज में गिना जाता है. मुझे अपने घासफूसी होने पर तरस आया और असली चाइनीज़ फ़ूड देखकर मज़ा. करीने से सजाया गया पूरा मेस हॉल देखते ही बन रहा था.
नॉनवेज वालों का स्वर्ग था लेकिन मुघलई डिशेस का अभाव था. ज़्यादातर चाइनीज़ थीं या फिर कॉन्टिनेंटल. जो हम भारतियों के गले से नीचे बड़ी मुश्किल से उतर सकती थीं. सभी कर्मचारी मूंह पर मास्क लगाये. सिर पर कैप या स्कार्फ और हाथों में ग्लव्स पहने हुए थे. ऐसी दिव्य व्यवस्था की कल्पना किसी ने नहीं की थी. सब उसे एक आम भारतीय कांफेरेंस की तरह मानकर चल रहे थे. लेकिन आयोजकों ने तो अपना खून, पसीना और पैसा खूब बहाया था. यूरोप के देशों से आये प्रतिभागी भी इस स्वागत सत्कार और अन्य व्यवस्था से अभीभूत थे. 

कुनमिंग शहर का वर्णन अगली क़िस्त में.
अपने कमेंट्स ज़रूर दीजियेगा.

Thursday, January 10, 2019

मेरी चीन यात्रा - 1 इंटरनेशनल फ्लाईट


साल 2009 की जुलाई में मुझे चीन जाने का निमंत्रण मिला, मौका था अंतर्राष्ट्रीय यूनियन फॉर अन्थ्रोपोलोजिकल एंड एथनोलोजिकल साइंसेज की 16वीं कांग्रेस का जो कि चीन के कुनमिंग शहर में हो रही थी और आयोजक थी युन्नान युनिवर्सिटी. दरअसल कुनमिंग युन्नान प्रान्त की राजधानी है. मुझे वहां इतनी बड़ी कांग्रेस के एक कांफेरेंस पैनल में बतौर को-चेयरपर्सन सहभागिता करने का अवसर मिला था. मैं शायद सबसे कम उम्र का पनेलिस्ट रहा होऊंगा. एक गर्व की बात यह थी कि हमारे पैनल में 42 शोध पत्र पढ़े जाने थे. जो कि संख्या के लिहाज़ से सबसे ज्यादा थे. मैं दो मामलों में ज्यादा उत्साहित था, पहला अपनी विदेश यात्रा को लेकर और दूसरा विश्व की सबसे बड़ी कांफेरेंस का हिस्सा बनकर वो भी बतौर पेनेलिस्ट.
चूँकि मेरी यह सबसे पहली विदेश यात्रा थी तो मन में एक कौतुहल मिश्रित भय था. आगे कोई दिक्कत न हो इसलिए हमने टिकट लखनऊ से ही करवा लिया था और वीज़ा भी. हमारा टिकट कोलकाता से बैंकाक फिर कुनमिंग के लिए हुआ था. हम 4 लोग कोलकाता के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बैंकाक के लिए थाई एयरवेज से रवाना हुए. कोलकाता एअरपोर्ट भी वहां की संस्कृति के अनुरूप ही बनाया और सजाया गया था. अब तो उसमे भी बहुत परिवर्तन हो चुके हैं. वर्तमान कोल्कता एअरपोर्ट बहुत विशालकाय है. खैर मन में चीन देखने की हसरत पाले मैं उड़ चला समुन्दर पार. हवाई जहाज काफी बड़ा था इतना बड़ा हवाई जहाज देखकर मैं अचम्भे में था. चूँकि पहली विदेश यात्रा थी तो पहली बार ही इंटरनेशनल फ्लाइट भी अन्दर से देखने का मौका मिला. सीटें 2:4:2 के अनुपात में थी, सौभाग्य से मेरी विंडो सीट थी जो कि मेरी प्रिय सीट है. मुझे हवाई जहाज को ज़मीन छोड़ते हुए देखना अच्छा लगता है. नीचे खेतों को देखकर लगता है जैसे किसी से काली सफ़ेद के बजाय हरी शतरंज बिछा रखी है. सीट पर ही बैंगनी रंग के पाउच में इअरप्लग्स रखे हुए थे जो कि सीट से जुड़े हुए थे. प्लेन में थाई एयरवेज़ का कॉपीराइटेड संगीत बज रहा था. बीच वाली सीटो के सामने बहुत बड़ा टेलीविज़न लगा हुआ था. जिस पर एक हिंदी फिल्म चल रही थी. मन प्रसन्न सामने अनिल कपूर की फिलिम और देसी लोग. कुछ देर बाद उड़ने की सारी औपचारिकतायें पूरी होने के बाद प्लेन ने जानी पहचानी घरघराहट के साथ उड़ान भरी. एक चीज़ की आराम थी कि इंटरनेशनल फ्लाईट में आप फोटो खींच सकते थे. उस समय घरेलु उड़ानों में फोटो खींचने पर मनाही थी. अब तो खैर सब जगह अलाउड है.
इधर प्लेन हवा में ऊंचे और ऊंचे जा रहा था उधर मेरे मन का रोमांच भी. थोड़ी देर बाद प्लेन में शराब परोसी गयी लेकिन मैं ठहरा पानीवादी इन्सान तो मैंने डाइट कोक पिया. शायद वाइन वालों के पेग पर कोई रोक नहीं थी क्योंकि पीछे की सीट के सज्जन तीन पी चुके थे. पीने-पिलाने के दौर के बाद खाना भी आ ही गया, मेरा तो मन खुश हो गया जैसे कण्ट्रोल में न रहा हो. ठेठ देसी थाली. राजमा, चावल, रोटी, अचार, रायता. उफ्फ, मन तो हवा में जैसे और ऊंचे पहुँच गया हो. इतनी ऊँचाई पर इन्डियन मसालेदार खाना वो भी गरमा गरम, वाह भाई वाह. लखनौव्वा क्या चाहे दो पूड़ी और सब्ज़ी लेकिन यहाँ तो पूरी थाली थी. थोड़ी ही देर में थाली सफाचट. मैंने खाने के लिए थाई एयरवेज़ को बहुत धन्यवाद कहा और थोड़ी देर के लिये सो गया.
कलकत्ते से बैंकाक का सफ़र बहुत लम्बा नहीं है थोड़ी ही देर बाद उद्घोषणा होने लगी कि हवाई जहाज बैंकाक के सुवर्णभूम हवाई अड्डे पर उतरने वाला है. मैं भी तैयार था पहली बार विदेशी सरज़मी छूने को. एअरपोर्ट पर उतरते ही आँखें जैसे चुन्धियाँ गयीं. अरे बाप रे इत्ता बड़ा एअरपोर्ट. उफ्फ्फ. मैं इसकी विशालता देखकर चकित था. अभी तक जिस एअरपोर्ट के बारे में पढ़ा था वह असल में इतना बड़ा होगा मैंने कल्पना भी नहीं की थी. वहां जटायु, राम, रावण की मूर्तियाँ, हिन्दू और बौद्ध धर्म से सबन्धित अन्य वस्तुएं करीने से बनाकर सजाकर रखी गयी थी. चारों और स्केलेटर्स का जाल बिछा हुआ था. हवाई अड्डे के अन्दर गोल्फ कार्ट्स भी चल रही थीं. मुस्तैद सिपाही अपनी पैनी निगाह हर आने जाने वाले यात्री पर रखे हुए थे. क्योंकि इस हवाई अड्डे पर ड्रग पैडलर्स अक्सर पकडे जाते हैं. भारत से चलते समय मुझे उनसे सावधान रहने की ताकीद दी गयी थी.
हमने थ्रू चेक-इन कर रखा था इसलिए हैण्डबैग के अलावा किसी और चीज़ की चिंता नहीं थी. हमारा सामान अपने आप दूसरी कनेक्टिंग फ्लाईट में लोड कर दिया जायेगा. आप भी जब कनेक्टिंग फ्लाईट से जाएँ तो लगेज थ्रू चेक-इन ही कीजिये इससे आप बाकी के झंझटों से बच जायेंगे. कुनमिंग की फ्लाईट में अभी 4-5 घंटे थे तो इतना समय तो हमें ट्रांजिट में ही गुज़ारना था. तो शुरू हुआ सुवर्णभूम हवाई अड्डा घूमने का सिलसिला. एक छोर से दूसरे नज़र नहीं आ रहा था. हाँ हर मिनट हवाई जहाजों की गडगडाहट सुनाइ दे रही थी और सुनाई दे रहा था हजारों लोगों का शोर. हवाई अड्डे पर शराब की कई दुकाने थीं मैंने इतने नामचीन ब्रांड्स पहली बार एकसाथ देखे थे. एक फोटो तुरंत खिंचवा भी ली यादगार के तौर पर. 
एअरपोर्ट पर घूमते फिरते समय बीतने लगा और तभी हमारी फ्लाईट की उद्घोषणा भी हो ही गयी. उस समय सुबह भी करीब ही थी. सुबह का साढ़े तीन शायद बज रहा था. इधर उधर चढ़ते हुए हम लोग भी अपने प्रस्थान वाले गेट पर सिक्यूरिटी चेकिंग के लिए पहुँच गए. मैंने भी जूते, बेल्ट और वेस्ट पाउच खोलकर ट्रे में रखा और लाइन में लग गया मेरी जामा तलाशी हुई तो पूछा गया कि-इज़ इट योर वेस्ट पाउच? मैंने कहा यस इट्स माइन. वे बोले- प्लीज कम दिस साइड एंड ओपन इट. समथिंग ससपीशियस इन दिस. मैं सन्न रह गया.. कि यहाँ क्या हो गया अब क्या होगा. यही सब सोचते सोचते मैंने अपना वेस्ट पाउच उनके सामने खोल दिया. उसमे से लिक्विड बाम की एक छोटी सी शीशी मिली. वे बोले- व्हाट इज़ दिस. मैंने कहाँ- दिस इस लिक्विड बाम, ऐज़ आई एम माईग्रेन पेशेंट. इट रीलीजेज़ माई पेन. इतना सुनकर उन्होंने उसे सूंघा वूंघा और फिर संतुष्ट होकर मुझे जाने दिया. मैंने चैन की सांस ली. थोड़ी देर बाद हम लोग अपनी दूसरी फ्लाईट में सवार थे.
शेष अगले अंक में
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