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Friday, August 13, 2010

हम एक ही रहे हम एक ही रहेंगे

हिन्दोस्तां हमारा हिन्दोस्तां हमारा,
दीनो धरम हमारा दिलबर वतन हमारा,
महबूब है हमारा
हमको है जां से प्यारा,
ये देश है हमारा ये देश है हमारा,
नानक के इस चमन में नफरत की बोलियाँ क्यूँ,
बापू के इस वतन में हिंसा की गोलियां क्यूँ,
इंदिरा की सरज़मी पे ये खूं की होलियाँ क्यूँ,
हंसों की इस ज़मी पे गिद्धों की टोलियाँ क्यूँ,
देखो जला न डाले कोई ये घर हमारा,
हिन्दोस्तां हमारा हिन्दोस्तां हमारा,
ये गोरखा के नारे कश्मीर के शरारे,
नेपाल की फिजाएं आसाम के इशारे,
षड़यंत्र है ये सारा पूरा ना हो सकेगा,
इन चंद आंधीयों से सूरज नहीं बुझेगा,
भाषा अज़ीज़ हमको मज़हब भी अपना प्यारा,
लेकिन है सबसे पहले हिन्दोस्तां हमारा,
हिन्दोस्तां हमारा हिन्दोस्तां हमारा,
भारत महा महान है महान ही रहेगा,
सैंतालिस जैसा अब और ना बंटेगा,
सब भारती के बेटे इस पर जिए मरेंगे,
हम एक ही रहे थे हम एक ही रहेंगे,
हम एक ही रहे थे हम एक ही रहेंगे,

Wednesday, August 11, 2010

पाँव के छाले

बरसात की भीगी रातों में फिर कोई कहानी याद आयी,
कुछ अपना ज़माना याद आया कुछ उनकी जवानी याद आयी,
कलिओं की तरह जो चिटकी थी उन गुलशन गुलशन होठों पर,
लो बैठे बिठाये आज हमे वो बात पुरानी याद आई,
हम भूल चुके थे किसने हमे दुनिया में अकेला छोड़ दिया,
जब गौर किया तो एक सूरत जानी पहचानी याद आयी,
कुछ पाँवके छाले कुछ आँसू तन्हाई कुछ दर्दे सफ़र,
उस बिछड़े हुए हमराही की एक एक निशानी याद आई.......





आज़ादी का दिन फिर आया . . . . . .

दोस्तों आज ११ अगस्त है, यानि तीन दिन बाद हमारा आज़ादी का दिन आने वाला है , हाँ हम इसी दिन १४-१५ अगस्त की आधी रात में आजाद हुए थे। अंग्रेजों ने हमे आजाद कर दिया था। हम गुलाम नहीं रहे थे। हम आजाद हो गए थे। लेकिन अँगरेज़ अपनी विरासत में हमे दे गए थे अपने द्वारा बनाई गई, शिक्षा , कानून और पुलिस व्यवस्था। जिसके लिए लॉर्ड मैकॉले ने कहा था की हमारा लक्ष्य काले अँगरेज़ पैदा करना है और आज आज़ादी के ६३ साल बाद भारत की आम जानता को अपने ऊपर शासन करने वाले काले अँगरेज़ ही मिले हैं। अगर बात करू पुलिस की तो हमारी पुलिस आज भी वही एक सौ पच्चीस साल पुराने ढर्रे पर ही चल रही , मतलब लाठी और डंडो से । जब जहाँ जिसको चाहती है उठाती है पीटती है और जेल में ठूंस देती है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे नाना दादा को गोरे अँगरेज़ मारते और पीटते थे, अब हमे ये काले अँगरेज़ पीटते हैं और बेईज्ज़ती करते हैं ।
आपको क्या लगता है हम आज़ाद हैं या गुलाम हैं ? मुझे तो लगता है की हम आज भी गुलाम हैं , और गुलामी में ही जिंदा हैं। न तो न्याय मिलता है क्योंकि हमारे साथ न्याय होता ही नहीं है उसे भी कुछ पैसे वाले लोग खरीद लेते हैं अपने लिए, हम लोग ठूंस दिए जाते हैं जेलों में , क्योंकि न्याय करने वाले लोग और न्यायालय तक हमे पहुँचाने वाली पुलिस आपस में मिले होतें हैं। जब जहाँ जिस पैसे वाले का मन होता है पुलिस के मुह पर पैसा मारता है और पुलिस हमे लाठियों से पीट कर या या सरे बाज़ार बेईज्ज़ती कर के ठूंस देती है गन्दी और बदबूदार जेलों में। मतलब हम आज भी अंग्रेजो के ही गुलाम हैं । फिर क्यूँ एक और स्वतंत्रता दिवस मनाएं ? आप बताएं ......
(मेरे एक दोस्त के साथ पुलिस ने ऐसा ही किया, ये पोस्ट उसी पर ही आधारित है)
हम जब तक चुपचाप इन काले अंग्रेजों के ज़ुल्म सहते रहेंगे, ये दो - दो कौड़ी के पुलिस वाले और माफिया अपनी मिलीभगत से हमे परेशान करते रहेंगे जैसे हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानिओं को गोरे अँगरेज़ करते थे । पुलिस और न्यायपालिका में बैठे हुए लोग हमारे लिए नहीं हैं वो माफिया, नेताओं और खुद के लिए हैं। आप तैयार रहिये मंजुनाथ और सत्येन्द्र दुबे बनने के लिए और अपने बच्चों को भी भगत सिंह या चंद्रशेखर की कहानी न सुनाइए क्योंकि अगर वो भगत बनेगे तो पुलिस के अत्याचार सहने पड़ेंगे और वो बड़े ही दुखदायी होते है और हाँ उन्हें डॉक्टर या इंजिनियर या प्रोफेसर भी न बनाइये क्योंकि कक्षा ८ पास पुलिस उनकी बेईज्ज़ती करेगी तो आप को थाने में रोना ही आयेगा।
आपको आपका स्वतंत्रता दिवस मुबारक। मेरा तब आयेगा जब ये काले अँगरेज़ नहीं रहेंगे , मैं खुली हवा और पुलिस रहित भारत में रहना चाहता हूँ...
जय हिंद , जय भारत.