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Wednesday, February 24, 2010


आज मैं मानव अधिकार विषय के विद्यार्थियों को मानव विकास के बारे में बता रहा था, उसमे मानव अधिकार की बात भी शामिल थी .... यकायक मुझे याद आया की जो लोग हमारे लिए नीतिआं इत्यादि बनाते हैं उन्हें हमारे विकास की कितनी चिंता रहती है या वे हमे हमारे पैसे के बारे में कितनी बातें बताते हैं........या वे खुद तो सायरन बजाते हुए जाम से निकल जाते हैं और हमे भीड़ में फंसा जाते हैं...... क्यूँ नहीं हम इन सबके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करते हैं... वे कौन से कारण हैं जो हमे हमारे ही अधिकारों के लिए एक जंग छेड़ने से रोकते हैं... क्या यही प्रजा का प्रजा के लिए प्रजा द्वारा शासन है ? यदि है तो हम युवा ऐसे किसी भी शासन को मानने के लिए बाध्य क्यूँ हैं ? वे कौन से कारणहैं जो हमे हमारे ही देश में हमारी ही आवाज़ को बुलंद करने से रोकते हैं........बातों ही बातों में ज़िक्र आया की पुलिस का अदना सा सिपाही हमे अपनी ऑंखें तरेर कर क्यूँ दिखाता है ? हम क्यूँ नहीं पुलिस को उसी की ही भाषा में जवाब देते हैं ? क्यूँ नहीं उसे जनता के चार जवानों के कोप का भाजन बनना पड़ता है ? जिस पर मेरी एक विद्यार्थी ने मुझसे ऐसा नहीं करने को कहा , हो सकता है वो अहिंसा की सच्ची सेवक हो, मैं भी हूँ लेकिन मेरे किये मेरे सम्मान से ज्यादा कुछ भी नहीं, पुलिस हमारी सेवक है राजा या मालिक नहीं , मैं अपने नौकर की हुडकी नहीं सह सकता.........मैं सड़क पे सायरन बजाकर निकल रहे अपने प्रतिनिधि को भी नहीं निकलने दे सकता.... क्यूंकि शासन मेरा है जो की मेरे द्वारा मेरे लिए किया जा रहा है ... फिर मेरा आदेश मानने वाला मेरे सामने कैसे निकल सकता है....... इसका जवाब है किसी के पास ?
फिर बात उठी की हम लोगों ने सत्रह साल अपने जीवन के सिर्फ शिक्षा ग्रहण करने में लगा दिए हैं , हम शिक्षित लोग हैं॥ हमे कोई दो कौड़ी का नेता कैसे अपनी बातों से धर्म या जाती के नाम पर भड़काने में सफल हो जाता है......और हम भड़क भी जाते हैं, तो सत्रह साल की शिक्षा गई पानी में....... इससे ठीक तो हम अशिक्षित ही थे ...... कम से कम ये सत्रह साल तो बच जाते.......
जवाब देने का वक़्त है आपके पास ...अगर तुम्हारे अन्दर चंद्रशेखर , भगत सिंह या अशफाक उल्ल्हा का खून है तो इन रक्त्खोरो को जवाब देने का समय आ गया है.............
खैर देर अभी भी नहीं हुई है जब जागो तभी सवेरा..... समय है जाग जाओ वरना अब किसी काले अँगरेज़ की गुलामी में अपने बच्चे पैदा करते नज़र आओगे ........................ और सड़कों पे अपने बच्चे की लाश को सीने से लगा कर उसके अधिकारों के लिए लाठी खाते नज़र आओगे........ जागो सामाजिक प्राणी जो हो......

Friday, February 12, 2010

महाराष्ट्र या फिर भारत राष्ट्र

जम्मू कश्मीर में पिछले कई सालों से उग्रवादी धार्मिक उन्माद फैला कर उसे भारत से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं ठीक यही चीज़ महाराष्ट्र में शिव सेना के कर्मठ कार्यकर्ता कर रहे हैं भाषा को आधार बना कर , अंतर सिर्फ इतना है की ये लोग एक क्षेत्रीय दल के कार्यकर्ता हैं और उग्रवादी एक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन के कार्यकर्ता हैं। अगर कसाब को मुंबई में गोली बरसाने के लिए सजाए मौत की बात हो रही है तो शिव सेना के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए कैसी सजा होनी चाहिए ...... ये सोचने का विषय है, क्यूंकि उसने गोलीं बरसाई और ये लाठी बरसाते हैं .... क्या महाराष्ट्र सिर्फ मराठी लोगों का है , अगर है तो अलग कश्मीर की मांग क्यों गलत है .... ...
सोचिये और बोलिए ...
आप को नहीं लगता की अजमल कसाब को जो सजा होनी चाहिए वही शिव सैनिको या मनसे के लोगों के लिए भी होने चाहिए।
ये देश आजाद हुआ तो मेरे दादा , नानाओ ने भी उतना ही खून बहाया जितना बाकीओं ने तो मेरा भी भारत के हर कोने पर उतना ही अधिकार है जितना बाकीओं का ......... तो ये फिर से काले अंग्रेज़ोंका राज्य क्यूँ । याद कीजिये की अँगरेज़ भी यही सब ही तो करते थे की "बांटो और राज्य करो " पहले ज़मीन बाटी अब भाषा के आधार पे बाँट दो,..... लेकिन हमारे अन्दर भी वीर सावरकर , चापेकर बंधुओं और भगत सिंह का ही खून है हम देश को फिर नहीं बटने देंगे , अब दूसरा जिन्ना इस देश में नहीं पैदा होगा और अगर उसने पैदा होने की कोशिश की तो एक अरब का मेरा भारत शिवसेना के कार्यालय के बाहर ही अपनी लघुशंका का त्याग करेगा और शिवसैनिक बाढ़ में ही बहते हुए नज़र आएंगे.....
जय हिंद

Friday, February 5, 2010

शेर सुनाइए मत, शेर बचाइए

आपको याद की पिछली बार अपने चिड़ियाघर की सैर कब की थी ? अरे हाँ और आपने अपने बचपन में शेर की कहानियां कितनी बार पढ़ी थी ? आपने तो मोगली भी देखा होगा , अरे वही the jungal book वाला जो चड्ढी पहन के पैदा हुआ था उसी में तो था शेर खान ....... लेकिन ये कहानी आने वाले दिनों में सही साबित होगी और शेर सिर्फ किस्से या कहानिओ में ही दिखाई देंगे.
सुनते हैं की हम लोग इन्सान हैं और ऊपर वाले ने बड़ी ही तमीज के साथ हमे बनाया है और हम में इंसानियत भी थोड़ी सी डाली है फिर आज हम वही इंसानियत क्यूँ भूलते जा रहे हैं , भाई जानवर तो भूख लगने पर ही शिकार करता है और तुमने उसे सिर्फ शौक और फालतू की दवाइयों के लिए मार डाला , अबे शर्म करो .....जिस दिन कोई तुम्हे मार कर देगा और तुम्हारी हड्डीओं से दवाई बनाएगा तब तुम चिल्लाना की मुझे मार कर अपना शौक पूरा कर लिया , यही काम तुमने शेर के साथ किया , .... हाँ मार दिया और अब तो सिर्फ १४११ ही बचे हैं , उन्हें भी मार कर उनकी खाल को बेच कर कुछ हज़ार रूपए बना लो बस .....और क्या .....अगर इतने बड़े ही मर्द हो तो जाओ ओसामा बिन लादेन को मार कर दिखाओ ............ और उसकी खाल को बेचो .....हजारो नहीं करोडो मिलेंगे ... जाओ और शिकार करो ओसामा का ...जाओ....
लेकिन ध्यान रखो आने वाली नस्लों को असली शेर सिर्फ तुम किताबों में ही दिखाना क्युंकी असली शेरो को तो आप मार कर अपनी सेहत बना चुके होंगे या उनकी खाल को अपने मेहमान खाने में सजा चुके होंगे ।
अच्छा एक बात तो बताइए की आपकी शेर से कोई दुश्मनी है क्या ? लेकिन वो तो बेचारा जंगल में रहता है और आप तो खालिस शहरवासी हैं फिर उस से इतनी जलन क्यूँ की आप उसे मार देंगे या उसकी मौत का खामोश बैठकर तमाशा ही देखते रहेंगे जैसे बन्दर का देखते थे।
यूँ हाथ पे हाथ धर कर बैठने से कुछ भी नहीं होगा कुछ तो करिए ....
अगर ऐसे ही कोई आपके बच्चों को मारता तो कया आप यूँ ही चुपचाप तमाशा देखते रहते ?
नहीं ..... तो फिर इन शेरो को अपना बच्चा ही समझिये और मारने वालों को सबक सिखाईये ....
जिस से जानवर भी आप पार गर्व कर सके.....
कुछ तो करिए ॥
मैंने शुरू कर दिया है........... अब आपकी बारी है .....
इस शानदार जानवर को बचाने की मुहीम शुरू कर दीजिये.......
ये आपकी पहल का इंतज़ार कर रहे हैं....................

Thursday, February 4, 2010

महंगाई


चलो भाई अब रसोई गैस भी सौ रूपए महंगी होने जा रही है लेकिन चिंता किसी को नहीं की अब क्या होगा, क्या सरकार का यही राज है, कहाँ बातें हर घर में रसोई गैस पहुचाने की और कहाँ सूखी लकड़ी बीनने तक पर असरकारी पाबंदियां लगी हुई हैं, मतलब सरकार सिर्फ कोरी बकवास ही कर रही है क्या...... घर घर में पकने वाली अरहर की दाल १०० रूपए किलो और अब तो और महंगी हो जाएगी क्यूंकि पेट्रोल और ड़ेसेलके दाम भी बढ़ने जा रहे है वह रे वह गरीब देश की अमीर सरकार ...... अमीर इसलिए क्यूंकि पेट भरने के संसाधनों पर भी कुछ पूँजी के पुजारीओं का ही अधिकार ....... देश गरीब और खाना महंगा... अरे हमसे सस्ता तो अमेरिका में है.... जहाँ विश्व के सर्वाधिक अमीर रहते हैं........ खैर देखते हैं सरकारी ऊँट किस करवट बैठता है ?
हाल फिलहाल बन्दे हो रहे बेदम, जोर से बोलो वन्दे मातरम.......