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Sunday, April 26, 2020

मेरी चीन यात्रा - 3 (खूबसूरत कुनमिंग शहर)


अगले दिन हमें अकेडमिक टूर पर जाना था. मैं सुबह जल्दी ही उठ गया था. सुबह जल्दी ही हो जाती है 4-4.30 बजे वहां सूर्योदय हो जाता था. सूरज की लाल किरने मेरे बिस्तर पर सुबह सवेरे ही अठखेलियाँ करने लगती थी. मेरी नींद टूटी मैंने खिड़की का पर्दा हटाकर नीचे देखा तो लोग बाग़ सड़क किनारे चीनी योगा कर रहे थे. इसे मैंने चीनी योग नाम इसलिए दिया क्योंकि भारतीय योग की ही तरह उनकी अपनी कुछ विशिष्ट शैलियाँ थीं. बीच में एक बुजुर्गवार खड़े होकर सबको बता रहे थे और लोग उनके चारों ओर गोल घेरे में खड़े होकर उनके दिशा निर्देश फॉलो कर रहे थे. सब कुछ एक रिदिम में लग रहा था. मैंने तो ऐसा सिर्फ हॉलीवुड की फिल्मों में ही देखा था. एक सबसे अच्छी बात यह थी कि जब यह योगाभ्यास किया जा रहा था तब एक ट्राफिक पुलिस ट्राफिक को डाइवर्ट कर रहा था मतलब योग करने वालों को पूरी छूट थी सड़क का इस्तेमाल करने की. शायद ऐसा इसलिए भी आसपास कोई पार्क न रहा हो तो सरकार ने ही ऐसे दिशा निर्देश दिए हों. सुबह सुबह ये सब देखकर मन बड़ा प्रसन्न हो गया कि हमारे पडोसी मुल्क में भी लोग अपनी परम्पराओं से जुड़े हुए हैं. परम्पराओं से जुड़ कर ही हम आगे जा सकते हैं. हाँ एक व्यावसायिक समाज कार्यकर्ता और समाज विज्ञानी होने के नाते रूढ़ियों को मानने के पक्ष में कभी नहीं रहा. लेकिन योग तो हमारे जीवन का एक हिस्सा है जो ज़रूरी तौर पर अपनाना चाहिए.
खैर ये सब देखकर मैं अभीभूत हो गया. थोड़ी देर तक उन्हें देखता रहा फिर बाथरूम चला गया क्योंकि जल्दी ही फ्रेश होकर निकलना जो था. आज हमें चाइनीज़ गाँव और कुछेक कबीलों के पास जाना था. ये सब हमारे अकेडमिक टूर का हिस्सा था. मैं उत्साहित तो बहुत था. क्योंकि इसके पहले कभी मंगोल कबीलों से मिला नहीं था सिर्फ किताबों में ही पढ़ रखा था. हमारे होटल से युन्नान युनिवेर्सिटी कोई दो या ढाई किलोमीटर होगी तो हम लोग पैदल ही चल दिए. पैदल चलने के कई फायदे हैं वे तब बढ़ जाते हैं जब आप विदेश भ्रमण पर हों. आप चारों ओर देख सकते हैं वहां की आबोहवा महसूस कर सकते हैं और सबसे बड़ी बात वहां के स्थानीय नागरिकों से इंटरएक्शन किया जा सकता है जो कि हमने किया. मी-हाउ बोलने वाले चीनी हम भारतीयों को देखकर हाय-हेलो बोलने लगे, हा हा हा. कुनमिंग शहर एक अत्यंत रमणीक और साफ़ सुथरा नगर है. लोग अनुशासन में रहना पसंद करते हैं. हम भारतियों की तरह नहीं कि जहाँ जगह मिले खुद को ठूंस लो बाकी निकल तो आप जायेंगे ही. चौड़े-चौड़े फूटपाथ थे. पैदल चलने वाले लोग सड़क पर नहीं चल रहे थे. शहर हरा भरा था. चूँकि जुलाई थी तो वहां भी बारिश का मौसम था हिमालय से नज़दीक होने की वजह से थोड़ी ठण्ड भी हो गयी थी. मुझे अफ़सोस हुआ कि मैं अपनी जैकेट होटल में ही क्यों छोड़ आया. मैंने कईं लोगों को इलेक्ट्रिक स्कूटर पर देखा. जगह-जगह उनके लिए चार्जर लगे हुए थे. भारत में तब "यो बाइक्स" आई थीं लेकिन बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं हुई थीं क्योंकि हम भारतीयों को कम माइलेज की भारी मोटरसाइकिल चलाना ज्यादा पसंद है न कि हलकी किफायती बाइक्स. इस शहर में तो इलेक्ट्रॉनिक बाइक्स ही नज़र आ रही थीं.



टहलते-टहलते अब तक हम लोग युन्नान यूनिवर्सिटी आ चुके थे. सड़क पर लम्बी लम्बी लक्सरी बसेस खड़ी हुई थी. एक बस में हम लोग जाकर बैठ गए उसमे कुछ दक्षिण भारतीय प्रोफेसर्स पहले से ही बैठे हुए थे हम उन्ही के पास अपना परिचय देकर बैठ गए और थोड़ी देर में वार्तालाप का दौर आगे बढ़ने लगा. मेरे ग्रुप के लोग इंग्लिश में बात कर रहे थे. अगली सीट पर बैठी एक महिला प्रोफ़ेसर जो कि बड़ी देर से हमें सुन रही थीं. अपनी सीट से उठीं हम तक आयीं और इंग्लिश में बोली कि यू आल आर लुकिंग इंडियन्स, इफ यू आर इंडियंस देन यू शुड टॉक इन हिंदी... ऐज़ वी आर फ्रॉम स्पेन एंड वी आर टॉकिंग इन आवर लैंग्वेज.. हम लोग अचंभित थे. वे हमें डांट रही थीं या मातृभाषा के प्रति हमें प्रेम सिखा रही थीं. हम लोग अभी भी उत्तर और दक्षिण भारतीय होने में ही उलझे हुए थे. हम जब तक समझते तब तक बस में गाइड आ चुकी थीं. जो इंग्लिश और मंदारिन में हमारा वेलकम कर रही थीं. गाइड की सुविधा होने से हमें बड़ी राहत मिली. गाइडिंग का काम कोई और नहीं बल्कि युनार्सिटी के छात्र/छात्राएं ही कर रहे थे. यहाँ भी अभिनव प्रयोग. किसी प्रोफेशनल गाइड को रखने के बजाय विद्यार्थियों को रखना समझदारी से भरा निर्णय ही कहा जायेगा.
आपकी प्रतिक्रिया का इन्तज़ार रहेगा।


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