भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहाँ हर पाँच साल पर
लोकसभा और विधानसभा के चुनाव देश का भविष्य तय करते हैं. चुनावों के दौरान एक दौर
चलता है जिसमे पार्टियां अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्रों को जनता के समक्ष रखती
हैं. जिनमे लोक-लुभावन वादे किये जाते हैं. चुनावी घोषणा पत्र पार्टी की विचारधारा को
दर्शाते हैं. इन्ही के द्वारा अन्य मतदाताओं की तरह युवाओं को भी आकर्षित करने का
प्रयास किया जाता है. लेकिन युवा राजनीतिक दलों के लिए महज़ “वर्क फ़ोर्स” ही है, जो
पोस्टर चिपकाने, बैनर बाँधने, नारे लगाने और चिल्लाने के काम आता है, वह राजनीतिक दलों
के घोषणापत्रों में है ही नहीं. ताजा
आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान में भारत की आधी आबादी की उम्र 25
साल से कम है. जनसंख्या का 35 प्रतिशत से अधिक हिस्सा 20 वर्ष की आयु से नीचे है और वर्ष 2020 तक भारत में 325 लाख
लोग काम करने की
उम्र तक पहुँच जायेंगे, जो दुनिया में युवाओं की सबसे बड़ी संख्या होगी. ऐसा उस समय होगा जब दुनिया के बाकी विकसित देशों में उम्रदराज़ जनसंख्या एक
समस्या बनकर खड़ी होगी. अनुमान है कि 2030 में भारत में 28 वर्ष से कम
उम्र के नागरिकों की संख्या कुल
जनसंख्या का 50
फीसदी होगी. उसी समय भारत दुनिया में सबसे बड़ी जनसंख्या वाला ऐसा देश बनेगा, जिसमें युवाओं का अनुपात सबसे अधिक होगा, लेकिन यह युवा पार्टियों के
मेनिफेस्टो में उसी तरह है जैसे भूसे में सुई.
राजनीतिक
विश्लेषक मानते हैं कि युवाओं की इस तादाद ने राजनीति में अपनी भूमिका को नई दिशा दी है. इन युवाओं का अपना
एक राजनीतिक
कमिटमेंट, एक सोच और वोट देने को लेकर एक अलग दृष्टि
है. इस मान्यता के
चलते युवा वर्ग द्वारा मौजूदा राजनीति की दिशा बदलने का
आभास मिलता है. पिछले चार चुनावों के आँकड़ों
को देखे तो पता चलता है कि युवाओं का किसी एक पार्टी की ओर रुझान नहीं है, युवाओं का वोट हर बड़ी राजनीतिक पार्टी में करीब-करीब उसी अनुपात में बंट गया जिस अनुपात में पार्टी के कुल वोट. हर चुनाव में युवाओं की सोच बदलती गई है, कहने
का मतलब युवाओं ने उसी पार्टी को अपना वोट दिया जिसमे उन्होंने अपने लिए कुछ देखा.
दिल्ली विधान सभा के नतीजे इसी सोच का परिणाम है. ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि युवाओं
की प्रत्याशायें आज के नेताओं से ज़्यादा हैं लेकिन उनकी इस सोच को पार्टियाँ नकार
देती हैं. पिछले लोकसभा चुनावों को अगर देखें तो पता चलता है कि युवाओं के लिए कभी
किसी पार्टी ने कुछ नया नहीं किया जिसको लेकर युवा एकजुट हो किसी एक पार्टी को वोट
करें. हालाँकि सभी पार्टियों की अपनी-अपनी यवा इकाईयां हैं, जो डिग्री कॉलेज से
लेकर विश्वविद्यालयों तक खुद को अंगद का पैर बताती हैं और इन्ही के दम पर विभिन्न
दल कभी अपने प्रदर्शनों को सफल बनाते हैं तो कभी अपनी रैलियों को.
आज़ादी
से लेकर आज तक कभी भी युवा किसी भी पार्टी के चुनावी एजेंडे में नहीं रहा. उससे
सिर्फ वादे किये गए और उन्हें पूरा नहीं किया गया जिसके कारण युवाओं में कई दशकों
का असंतोष भरा हुआ है. अगर बॉलीवुड की बात करें तो कुछ साल पहले बनने वाली फिल्मों
में इसी असंतोष को फिल्माया और दर्शाया जाता था, हालाँकि आज उन कहानियों ने कोई और
रुख अख्तियार कर लिया है. अलग-अलग मंचों से युवाओं का सिर्फ राजनीतिकरण करने की
कोशिश की गई लेकिन “यूज़ एंड थ्रो” के फलसफे के चलते उस राजनीतिकरण को सही दिशा और
दशा नहीं मिल पाई. आज भी युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा रोज़गार ही है और रोज़गार सृजन
में सभी दल पीछे हैं. यहाँ यह बात दीगर है कि अभी भी युवा बुज़ुर्ग नेताओं के पीछे
उनकी जय-जयकार करने वाली भीड़ ही है या हथियार लेकर चलने वाले उनके अंगरक्षक. कहने
में संकोच नहीं है कि चुनावी घोषणापत्रों से युवाओं का गायब होना उनकी ही कमज़ोरी
का परिणाम है. युवा अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए कभी जागरूक ही नहीं रहा. उसने
चंद्रशेखर और भगत सिंह को महज़ किस्से कहानियों तक सीमित कर दिया उन्हें कभी अपने
जीवन में उतारा ही नहीं. हालाँकि युवाओं ने पिछले दिनो दिल्ली की सत्ता बदलने में
अहम भूमिका निभाई है लेकिन ये भी देखना होगा कि सवा करोड़ की दिल्ली का बदलाव सवा अरब तक जाता है या
नहीं.
राजनीतिक
दलों को ये सोचना चाहिए कि यूथ कोई आम वोटर नहीं है, ये भविष्य में कम से कम
दस-बारह चुनाव लड़वाएंगे और हर पाँच साल पर ये और ज़्यादा परिपक्व होंगे. जैसे-जैसे
इनकी राजनीतिक समझ बढ़ती जायेगी वैसे-वैसे ये मंझे हुए नेता के तौर पर जाने
जायेंगे. पार्टीज़ का “यूथ मेनिफेस्टो” युवाओं को भटकने से बचा सकता है, उन्हें
जिम्मेदार नागरिक बना सकता है. जीतने वाली पार्टी का मेनिफेस्टो देश के आचार-विचार
के साथ-साथ उसकी आर्थिक नीतियों को प्रभावित करता है, अगर ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं
पर ध्यान लगाया जायेगा तो युवा आबादी के लिए प्रगतिशील और स्वस्थ माहौल बनेगा
जिससे देश का विकास होगा क्योंकि युवा जानते हैं कि वे भी देश के विकास के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना कोई और
प्रौढ़ नागरिक. युवा कला, संगीत और
खेल जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रुचि लेकर बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं. नेताओं
को युवाओं को यह भरोसा दिलाने की
जरुरत है कि वे भारत के आम मतदाता की तरह देश के लिए महत्वपूर्ण हैं, इसलिए उनकी
अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर चुनावी घोषणा पत्र बनाया गया है, ऐसा करके राजनीतिक
दल युवाओं पर कोई एहसान नहीं करेंगे बल्कि निराशा से भरे युवाओं के हौसलों को नई
उड़ान देंगे. इन युवाओं की नई उमंगें हैं, नई तरंगे हैं और उनकी जवानी तो उनकी है
ही, ज़रूरत बस उनके लिए कुछ करने की है, जिसके लिए उनकी फैली हुई हथेली पर कुछ रखने
की ज़रूरत नहीं है बल्कि उसकी मुट्ठी बनाने की है, जो सिर्फ मेनिफेस्टो में उन्हें
जगह देने और उसमे उनके लिए किये गए वादों को पूरा करने से होगा.