भोर
का सूरज मेरी खिड़की से साफ़ दिख रहा था. अरुणिमा पूरब में अपना प्रकाश
धीरे धीरे फैला रही थी. समय कोई 5 बजकर 30 मिनट होने वाला होगा. मैंने सोचा लाओ इसे
कैमरे में कैद कर लूँ. इधर उधर कैमरा देखा लेकिन नहीं दिखा फिर ध्यान आया कि वह तो
हैंडबैग के साथ ऊपर रखा हुआ था. मैंने भी समय न गवांते हुए इस अद्भुत क्षण को
अपनी आँखों में कैद करने की कोशिश की और मेरी कोशिश रंग लाई. अहा... कभी न भूलने वाला दृश्य था वह,
शायद इसे ही नयनाभिराम कहते हैं. भारत हो या चीन पूरब हो या पच्छिम सूर्योदय और
सूर्यास्त सब एक ही जैसे होते हैं. कहीं कोई अंतर नहीं फिर धरती पर खिंची लाइनों
के लिए लोग लड़ते क्यों हैं. मैं यही सब सोच रहा था कि कुनमिंग एअरपोर्ट पर फ्लाईट की
लैंडिंग की उद्घोषणा होने लगी. उद्घोषणा सुनकर मेरी त्रन्दा टूटी. सीट बेल्ट बाँधने के लिए
ढूँढने लगा. मन में फिर से वही उमंग कि अब शीघ्र ही चीन की धरती देखने को मिलेगी. एक और चीनी धरती देखने की उमंग तो दूसरी और यह डर कि चीनी हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे. क्योंकि अभी तक जैसा फिल्मों में देखा सुना उसमे तो चीनियों को एकदम नेगेटिव ही दिखाया भले हमारा उनका ट्रेड कितना ही क्यों न हो. फिर सोचा चलो जो होगा देखा जायेगा.
जल्दी
ही हमारी फ्लाईट कुनमिंग एअरपोर्ट पर लैंड कर गयी. एक बड़ी और सुन्दर सी बस हमें
लेने आई. एयरपोर्ट पर हम सब इमिग्रेशन की लाइन में लग गए. मेरे पीछे कई और
लोग भी थे. काउंटर पर बैठी महिला ने सबसे
पहले मुझसे “मी-हाउ” कहा. मंदारिन में जिसका मतलब नमस्ते होता है, मैंने भी उनसे हेल्लो
कहा. इस पर उन्होंने आने का परपस पूछा तो मैंने कहा कि कांफेरेंस, मेरे कांफेरेंस
कहने पर उन्होंने मुझसे इनविटेशन लेटर माँगा जो कि मैंने हाथ में निकालकर रखा हुआ
था मैंने तुरंत उसे प्रस्तुत किया. संतुष्ट होने पर उन्होंने चीन आने पर फिर से
मेरा स्वागत किया और कांफेरेंस में सफल होने की शुभकामनायें भी दीं. मैंने भी थैंक
यू कहा और आगे बढ़ गया. यहाँ से
मुझे लगने लगा कि चीन का ये भ्रमण अच्छा होने वाला है क्योंकि अभी तक जितने भी लोग
मिले सभी अदब तहजीब से मिल रहे थे. एअरपोर्ट पर ही कांफेरेंस प्रतिनिधि के रूप में कुछ छात्र
काउंटर लगाए बैठे हुए थे हम लोग सीधे उनके पास गए उन्हें अपना इनविटेशन लैटर और
होटल का रिजर्वेशन दिखाया. तुरंत हमारे लिए टैक्सी का इंतजाम हुआ और हम लोग सकुशल
एक थ्री स्टार होटल आ गए. इस समय मुझे उसका नाम याद नहीं आ रहा हैं. लेकिन होटल था
बहुत आलीशान. एअरपोर्ट से लेकर होटल तक सड़कें साफ़ सुथरी थीं. सब लोग ट्राफिक नियमों का पालन करते हुए दिख रहे थे. कोई आपाधापी नहीं जबकि चीन की आबादी हमसे ज्यादा है. लेकिन लोग किसी जल्दी में नहीं दिखे. हमारा लखनऊ होता तो सड़कों पर बलगम व मसाला युक्त लाल थूक और लोग एक दुसरे के ऊपर चढ़कर निकलने को बेताब होते. कोलकाता में बदलवाई गयी करेंसी यहाँ काम आ रही थी. थोड़ा कन्फ्यूज़न ज़रूर था लेकिन जल्दी ही करेंसी समझ आ गयी थी.
अपने आलिशान होटल पहुंचकर हम
लोगों ने नहाया धोया और तैयार होकर चल दिए कांफेरेंस स्थल “युन्नान यूनिवर्सिटी”. होटल में भी हमारा खूब सत्कार हुआ. मैं भी सबसे मी-हाउ बोलने लगा. हमारे लिए होटल के बाहर बस इंतज़ार कर रही थी. पानी के लिए इधर उधर देख ही रहा था कि एक छात्र ने पानी की बोतल आगे बढ़ा दी. मैंने फिर खुश हुआ. इसके बाद होटल से ही पानी की कई बोतलें दे दी
गयी थीं. यहीं से लगने लगा था कि आयोजकों ने इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के सफल होने
में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है. क्योंकि सुना था विदेशों में पानी बहुत महंगा
मिलता है और यहाँ तो नदियाँ बह रही थी. हमारे लिए ख़ास इंतजामात थे. आगे पुलिस की
एक जीप चल रही थी जो हमें एस्कॉर्ट कर रही थी. रास्ता हमारे लिए एकदम खाली था, पीछे और भी कई बसे थीं. यहाँ तो खाली रास्ता दिखे तो समझिये कि कोई नेता जी चले आ रहे हैं. युनिवर्सिटी के रास्ते पर जगह-जगह डेलीगेट्स के स्वागत के लिए बैनर्स लगाए गए थे. भारत में रैली या चुनाव के दौरान स्वागत सत्कार किया जाता है ऐसी ही परंपरा है. कहीं भी ट्राफिक जाम नहीं था लोगों को नियमों का पालन करते हुए देखकर बड़ा अच्छा लगा. हमारी बसों को देखकर लोग हाथ हिलाकर अभिवादन भी कर रहे थे. चीन आकर इस स्वागत से
हम सब डेलिगेट्स अभीभूत थे. होते करते यूनिवर्सिटी भी आ गयी. हम सब उतर गए और सबसे
पहले रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया. हमारा पैनल दो दिन चलने वाला था. खाने पीने की
चिंता नहीं थी सब कुछ कांफेरेंस में ही था. चूँकि पहले दिन से ही हमारा पैनल था इसलिए सारा ध्यान उसी पर केन्द्रित था.
पहला
दिन निपटाकर मैंने सोचा चलो पहले यूनिवर्सिटी घूमी जाए. मैंने बैग लिया और निकल
पड़ा घूमने. एकड़ों में फैले परिसर में सब कुछ करीने से सजाया गया था. नए पुराने का कॉम्बिनेशन बहुत ही अच्छा दिखाई दे रहा था. रात को समूचा
कैम्पस लाइट से जगमग हो रहा था. मैं वहीं फूटपाथ पर बैठ कर परिसर का आनंद ले रहा था कि एकाएक मुझे इंडो-चाइना वॉर याद आ गयी और "कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों..." गाना याद आ गया, जिससे मन
थोडा व्यथित हुआ लेकिन जल्दी ही इस अवसाद से बाहर निकला और मैं आगे बढ़ा. गणित, दर्शन,
इतिहास सभी विभाग बहुत ही बड़े-बड़े थे और पूरे परिसर में कांफेरेंस के विभिन्न सत्र
ही चल रहे थे. एक विभाग में युन्नान यूनिवर्सिटी के मॉडल को सजाया गया था. जहाँ
तमाम डेलिगेट्स अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे थे. मैंने भी खिंचवाई और आगे बढ़ गया. किताबों से विशेष लगाव है तो लाइब्रेरी की ओर मुखातिब हुआ. उसे देखकर मैं अवाक रह गया और मुंह खुला का खुला रह गया, पता किया कि इस लाइब्रेरी में 1 करोड़ से भी ज्यादा किताबें हैं. मैं दंग रह गया
हमारे यहाँ तो इतनी क्या 10 लाख किताबो के बारे में भी नहीं सोचा जा सकता है. लाइब्रेरी के लिए फंड्स का रोना हर यूनिवर्सिटी में आम है.
घूमने-घामने के बाद लगी भूख. मेरी कांफेरेंस किट में डिनर के कूपन्स थे जिन्हें लेकर मैं मेस चला गया. शानदार मेस थी वह. यहां मौजूद छात्रों को जो हमे अटेंड कर रहे थे, कूपन दिया और सीधे डाइनिंग हॉल में प्रवेश कर गया. वहां देखा डिनर
की दिव्य व्यवस्था थी. हाँ मन में डर और
हिचक ज़रूर थी कि कीड़े-मकोड़े तो नहीं होंगे. क्योंकि मैं तो मांसाहारी भी नहीं हूँ
जो पोर्क वगैरह खाकर काम चला लूँ. लेकिन वहां डाइनिंग टेबल पर वेज और नॉन वेज के
स्लिप्स लगे हुए थे. फिर भी घासफूस वालों के लिए कुछ नहीं था. खोजबीन किया तो बॉयल्ड
मूंगफली और ग्रीन एपल्स दिखे. मैंने झटपट बटोरे और जुट गया खाने में. कोल्डड्रिंक्स
भी भरपूर था. जितने दिन रहा उतने दिन बॉयल्ड मूंगफली, एप्पल, ग्रेप्स और कोल्ड
ड्रिंक्स से ही काम चलाया गया. अंडे को यहाँ वेज में गिना जाता है. मुझे अपने घासफूसी होने पर तरस आया और असली चाइनीज़ फ़ूड देखकर मज़ा. करीने से सजाया गया पूरा मेस हॉल देखते ही बन रहा था.
नॉनवेज वालों का स्वर्ग था लेकिन मुघलई डिशेस का अभाव था. ज़्यादातर चाइनीज़ थीं या फिर कॉन्टिनेंटल. जो हम भारतियों के गले से नीचे बड़ी मुश्किल से उतर सकती थीं. सभी कर्मचारी मूंह पर मास्क लगाये. सिर पर कैप या स्कार्फ और हाथों में ग्लव्स पहने हुए थे. ऐसी दिव्य व्यवस्था की कल्पना किसी ने नहीं की थी. सब उसे एक आम भारतीय कांफेरेंस की तरह मानकर चल रहे थे. लेकिन आयोजकों ने तो अपना खून, पसीना और पैसा खूब बहाया था. यूरोप के देशों से आये प्रतिभागी भी इस स्वागत सत्कार और अन्य व्यवस्था से अभीभूत थे.
कुनमिंग शहर का वर्णन अगली क़िस्त में.
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