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Monday, January 14, 2019

मेरी चीन यात्रा - 2 (खूबसूरत युन्नान युनिवर्सिटी)


भोर का सूरज मेरी खिड़की से साफ़ दिख रहा था. अरुणिमा पूरब में अपना प्रकाश धीरे धीरे फैला रही थी. समय कोई 5 बजकर 30 मिनट होने वाला होगा. मैंने सोचा लाओ इसे कैमरे में कैद कर लूँ. इधर उधर कैमरा देखा लेकिन नहीं दिखा फिर ध्यान आया कि वह तो हैंडबैग के साथ ऊपर रखा हुआ था. मैंने भी समय न गवांते हुए इस अद्भुत क्षण को अपनी आँखों में कैद करने की कोशिश की और मेरी कोशिश रंग लाई. अहा... कभी न भूलने वाला दृश्य था वह, शायद इसे ही नयनाभिराम कहते हैं. भारत हो या चीन पूरब हो या पच्छिम सूर्योदय और सूर्यास्त सब एक ही जैसे होते हैं. कहीं कोई अंतर नहीं फिर धरती पर खिंची लाइनों के लिए लोग लड़ते क्यों हैं. मैं यही सब सोच रहा था कि कुनमिंग एअरपोर्ट पर फ्लाईट की लैंडिंग की उद्घोषणा होने लगी. उद्घोषणा सुनकर मेरी त्रन्दा टूटी. सीट बेल्ट बाँधने के लिए ढूँढने लगा. मन में फिर से वही उमंग कि अब शीघ्र ही चीन की धरती देखने को मिलेगी. एक और चीनी धरती देखने की उमंग तो दूसरी और यह डर कि चीनी हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे. क्योंकि अभी तक जैसा फिल्मों में देखा सुना उसमे तो चीनियों को एकदम नेगेटिव ही दिखाया भले हमारा उनका ट्रेड कितना ही क्यों न हो. फिर सोचा चलो जो होगा देखा जायेगा.
जल्दी ही हमारी फ्लाईट कुनमिंग एअरपोर्ट पर लैंड कर गयी. एक बड़ी और सुन्दर सी बस हमें लेने आई. एयरपोर्ट पर हम सब इमिग्रेशन की लाइन में लग गए. मेरे पीछे कई और लोग  भी थे. काउंटर पर बैठी महिला ने सबसे पहले मुझसे “मी-हाउ” कहा. मंदारिन में जिसका मतलब नमस्ते होता है, मैंने भी उनसे हेल्लो कहा. इस पर उन्होंने आने का परपस पूछा तो मैंने कहा कि कांफेरेंस, मेरे कांफेरेंस कहने पर उन्होंने मुझसे इनविटेशन लेटर माँगा जो कि मैंने हाथ में निकालकर रखा हुआ था मैंने तुरंत उसे प्रस्तुत किया. संतुष्ट होने पर उन्होंने चीन आने पर फिर से मेरा स्वागत किया और कांफेरेंस में सफल होने की शुभकामनायें भी दीं. मैंने भी थैंक यू कहा और आगे बढ़ गया. यहाँ से मुझे लगने लगा कि चीन का ये भ्रमण अच्छा होने वाला है क्योंकि अभी तक जितने भी लोग मिले सभी अदब तहजीब से मिल रहे थे. एअरपोर्ट पर ही कांफेरेंस प्रतिनिधि के रूप में कुछ छात्र काउंटर लगाए बैठे हुए थे हम लोग सीधे उनके पास गए उन्हें अपना इनविटेशन लैटर और होटल का रिजर्वेशन दिखाया. तुरंत हमारे लिए टैक्सी का इंतजाम हुआ और हम लोग सकुशल एक थ्री स्टार होटल आ गए. इस समय मुझे उसका नाम याद नहीं आ रहा हैं. लेकिन होटल था बहुत आलीशान. एअरपोर्ट से लेकर होटल तक सड़कें साफ़ सुथरी थीं. सब लोग ट्राफिक नियमों का पालन करते हुए दिख रहे थे. कोई आपाधापी नहीं जबकि चीन की आबादी हमसे ज्यादा है. लेकिन लोग किसी जल्दी में नहीं दिखे. हमारा लखनऊ होता तो सड़कों पर बलगम व मसाला युक्त लाल थूक और लोग एक दुसरे के ऊपर चढ़कर निकलने को बेताब होते. कोलकाता में बदलवाई गयी करेंसी यहाँ काम आ रही थी. थोड़ा कन्फ्यूज़न ज़रूर था लेकिन जल्दी ही करेंसी समझ आ गयी थी.
अपने आलिशान होटल पहुंचकर हम लोगों ने नहाया धोया और तैयार होकर चल दिए कांफेरेंस स्थल “युन्नान यूनिवर्सिटी”. होटल में भी हमारा खूब सत्कार हुआ. मैं भी सबसे मी-हाउ बोलने लगा. हमारे लिए होटल के बाहर बस इंतज़ार कर रही थी. पानी के लिए इधर उधर देख ही रहा था कि एक छात्र ने पानी की बोतल आगे बढ़ा दी. मैंने फिर खुश हुआ. इसके बाद होटल से ही पानी की कई बोतलें दे दी गयी थीं. यहीं से लगने लगा था कि आयोजकों ने इस अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के सफल होने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है. क्योंकि सुना था विदेशों में पानी बहुत महंगा मिलता है और यहाँ तो नदियाँ बह रही थी. हमारे लिए ख़ास इंतजामात थे. आगे पुलिस की एक जीप चल रही थी जो हमें एस्कॉर्ट कर रही थी. रास्ता हमारे लिए एकदम खाली था, पीछे और भी कई बसे थीं. यहाँ तो खाली रास्ता दिखे तो समझिये कि कोई नेता जी चले आ रहे हैं. युनिवर्सिटी के रास्ते पर जगह-जगह डेलीगेट्स के स्वागत के लिए बैनर्स लगाए गए थे. भारत में रैली या चुनाव के दौरान स्वागत सत्कार किया जाता है ऐसी ही परंपरा है. कहीं भी ट्राफिक जाम नहीं था लोगों को नियमों का पालन करते हुए देखकर बड़ा अच्छा लगा. हमारी बसों को देखकर लोग हाथ हिलाकर अभिवादन भी कर रहे थे. चीन आकर इस स्वागत से हम सब डेलिगेट्स अभीभूत थे. होते करते यूनिवर्सिटी भी आ गयी. हम सब उतर गए और सबसे पहले रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया. हमारा पैनल दो दिन चलने वाला था. खाने पीने की चिंता नहीं थी सब कुछ कांफेरेंस में ही था. चूँकि पहले दिन से ही हमारा पैनल था इसलिए सारा ध्यान उसी पर केन्द्रित था.
पहला दिन निपटाकर मैंने सोचा चलो पहले यूनिवर्सिटी घूमी जाए. मैंने बैग लिया और निकल पड़ा घूमने. एकड़ों में फैले परिसर में सब कुछ करीने से सजाया गया था. नए पुराने का कॉम्बिनेशन बहुत ही अच्छा दिखाई दे रहा था. रात को समूचा कैम्पस लाइट से जगमग हो रहा था. मैं वहीं फूटपाथ पर बैठ कर परिसर का आनंद ले रहा था कि एकाएक मुझे इंडो-चाइना वॉर याद आ गयी और "कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों..." गाना याद आ गया, जिससे मन थोडा व्यथित हुआ लेकिन जल्दी ही इस अवसाद से बाहर निकला और मैं आगे बढ़ा. गणित, दर्शन, इतिहास सभी विभाग बहुत ही बड़े-बड़े थे और पूरे परिसर में कांफेरेंस के विभिन्न सत्र ही चल रहे थे. एक विभाग में युन्नान यूनिवर्सिटी के मॉडल को सजाया गया था. जहाँ तमाम डेलिगेट्स अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे थे. मैंने भी खिंचवाई और आगे बढ़ गया. किताबों से विशेष लगाव है तो लाइब्रेरी की ओर मुखातिब हुआ. उसे देखकर मैं अवाक रह गया और मुंह खुला का खुला रह गया, पता किया कि इस लाइब्रेरी में 1 करोड़ से भी ज्यादा किताबें हैं. मैं दंग रह गया हमारे यहाँ तो इतनी क्या 10 लाख किताबो के बारे में भी नहीं सोचा जा सकता है. लाइब्रेरी के लिए फंड्स का रोना हर यूनिवर्सिटी में आम है. 
घूमने-घामने के बाद लगी भूख. मेरी कांफेरेंस किट में डिनर के कूपन्स थे जिन्हें लेकर मैं मेस चला गया. शानदार मेस थी वह. यहां मौजूद छात्रों को जो हमे अटेंड कर रहे थे, कूपन दिया और सीधे डाइनिंग हॉल में प्रवेश कर गया. वहां देखा डिनर की  दिव्य व्यवस्था थी. हाँ मन में डर और हिचक ज़रूर थी कि कीड़े-मकोड़े तो नहीं होंगे. क्योंकि मैं तो मांसाहारी भी नहीं हूँ जो पोर्क वगैरह खाकर काम चला लूँ. लेकिन वहां डाइनिंग टेबल पर वेज और नॉन वेज के स्लिप्स लगे हुए थे. फिर भी घासफूस वालों के लिए कुछ नहीं था. खोजबीन किया तो बॉयल्ड मूंगफली और ग्रीन एपल्स दिखे. मैंने झटपट बटोरे और जुट गया खाने में. कोल्डड्रिंक्स भी भरपूर था. जितने दिन रहा उतने दिन बॉयल्ड मूंगफली, एप्पल, ग्रेप्स और कोल्ड ड्रिंक्स से ही काम चलाया गया. अंडे को यहाँ वेज में गिना जाता है. मुझे अपने घासफूसी होने पर तरस आया और असली चाइनीज़ फ़ूड देखकर मज़ा. करीने से सजाया गया पूरा मेस हॉल देखते ही बन रहा था.
नॉनवेज वालों का स्वर्ग था लेकिन मुघलई डिशेस का अभाव था. ज़्यादातर चाइनीज़ थीं या फिर कॉन्टिनेंटल. जो हम भारतियों के गले से नीचे बड़ी मुश्किल से उतर सकती थीं. सभी कर्मचारी मूंह पर मास्क लगाये. सिर पर कैप या स्कार्फ और हाथों में ग्लव्स पहने हुए थे. ऐसी दिव्य व्यवस्था की कल्पना किसी ने नहीं की थी. सब उसे एक आम भारतीय कांफेरेंस की तरह मानकर चल रहे थे. लेकिन आयोजकों ने तो अपना खून, पसीना और पैसा खूब बहाया था. यूरोप के देशों से आये प्रतिभागी भी इस स्वागत सत्कार और अन्य व्यवस्था से अभीभूत थे. 

कुनमिंग शहर का वर्णन अगली क़िस्त में.
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Thursday, January 10, 2019

मेरी चीन यात्रा - 1 इंटरनेशनल फ्लाईट


साल 2009 की जुलाई में मुझे चीन जाने का निमंत्रण मिला, मौका था अंतर्राष्ट्रीय यूनियन फॉर अन्थ्रोपोलोजिकल एंड एथनोलोजिकल साइंसेज की 16वीं कांग्रेस का जो कि चीन के कुनमिंग शहर में हो रही थी और आयोजक थी युन्नान युनिवर्सिटी. दरअसल कुनमिंग युन्नान प्रान्त की राजधानी है. मुझे वहां इतनी बड़ी कांग्रेस के एक कांफेरेंस पैनल में बतौर को-चेयरपर्सन सहभागिता करने का अवसर मिला था. मैं शायद सबसे कम उम्र का पनेलिस्ट रहा होऊंगा. एक गर्व की बात यह थी कि हमारे पैनल में 42 शोध पत्र पढ़े जाने थे. जो कि संख्या के लिहाज़ से सबसे ज्यादा थे. मैं दो मामलों में ज्यादा उत्साहित था, पहला अपनी विदेश यात्रा को लेकर और दूसरा विश्व की सबसे बड़ी कांफेरेंस का हिस्सा बनकर वो भी बतौर पेनेलिस्ट.
चूँकि मेरी यह सबसे पहली विदेश यात्रा थी तो मन में एक कौतुहल मिश्रित भय था. आगे कोई दिक्कत न हो इसलिए हमने टिकट लखनऊ से ही करवा लिया था और वीज़ा भी. हमारा टिकट कोलकाता से बैंकाक फिर कुनमिंग के लिए हुआ था. हम 4 लोग कोलकाता के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बैंकाक के लिए थाई एयरवेज से रवाना हुए. कोलकाता एअरपोर्ट भी वहां की संस्कृति के अनुरूप ही बनाया और सजाया गया था. अब तो उसमे भी बहुत परिवर्तन हो चुके हैं. वर्तमान कोल्कता एअरपोर्ट बहुत विशालकाय है. खैर मन में चीन देखने की हसरत पाले मैं उड़ चला समुन्दर पार. हवाई जहाज काफी बड़ा था इतना बड़ा हवाई जहाज देखकर मैं अचम्भे में था. चूँकि पहली विदेश यात्रा थी तो पहली बार ही इंटरनेशनल फ्लाइट भी अन्दर से देखने का मौका मिला. सीटें 2:4:2 के अनुपात में थी, सौभाग्य से मेरी विंडो सीट थी जो कि मेरी प्रिय सीट है. मुझे हवाई जहाज को ज़मीन छोड़ते हुए देखना अच्छा लगता है. नीचे खेतों को देखकर लगता है जैसे किसी से काली सफ़ेद के बजाय हरी शतरंज बिछा रखी है. सीट पर ही बैंगनी रंग के पाउच में इअरप्लग्स रखे हुए थे जो कि सीट से जुड़े हुए थे. प्लेन में थाई एयरवेज़ का कॉपीराइटेड संगीत बज रहा था. बीच वाली सीटो के सामने बहुत बड़ा टेलीविज़न लगा हुआ था. जिस पर एक हिंदी फिल्म चल रही थी. मन प्रसन्न सामने अनिल कपूर की फिलिम और देसी लोग. कुछ देर बाद उड़ने की सारी औपचारिकतायें पूरी होने के बाद प्लेन ने जानी पहचानी घरघराहट के साथ उड़ान भरी. एक चीज़ की आराम थी कि इंटरनेशनल फ्लाईट में आप फोटो खींच सकते थे. उस समय घरेलु उड़ानों में फोटो खींचने पर मनाही थी. अब तो खैर सब जगह अलाउड है.
इधर प्लेन हवा में ऊंचे और ऊंचे जा रहा था उधर मेरे मन का रोमांच भी. थोड़ी देर बाद प्लेन में शराब परोसी गयी लेकिन मैं ठहरा पानीवादी इन्सान तो मैंने डाइट कोक पिया. शायद वाइन वालों के पेग पर कोई रोक नहीं थी क्योंकि पीछे की सीट के सज्जन तीन पी चुके थे. पीने-पिलाने के दौर के बाद खाना भी आ ही गया, मेरा तो मन खुश हो गया जैसे कण्ट्रोल में न रहा हो. ठेठ देसी थाली. राजमा, चावल, रोटी, अचार, रायता. उफ्फ, मन तो हवा में जैसे और ऊंचे पहुँच गया हो. इतनी ऊँचाई पर इन्डियन मसालेदार खाना वो भी गरमा गरम, वाह भाई वाह. लखनौव्वा क्या चाहे दो पूड़ी और सब्ज़ी लेकिन यहाँ तो पूरी थाली थी. थोड़ी ही देर में थाली सफाचट. मैंने खाने के लिए थाई एयरवेज़ को बहुत धन्यवाद कहा और थोड़ी देर के लिये सो गया.
कलकत्ते से बैंकाक का सफ़र बहुत लम्बा नहीं है थोड़ी ही देर बाद उद्घोषणा होने लगी कि हवाई जहाज बैंकाक के सुवर्णभूम हवाई अड्डे पर उतरने वाला है. मैं भी तैयार था पहली बार विदेशी सरज़मी छूने को. एअरपोर्ट पर उतरते ही आँखें जैसे चुन्धियाँ गयीं. अरे बाप रे इत्ता बड़ा एअरपोर्ट. उफ्फ्फ. मैं इसकी विशालता देखकर चकित था. अभी तक जिस एअरपोर्ट के बारे में पढ़ा था वह असल में इतना बड़ा होगा मैंने कल्पना भी नहीं की थी. वहां जटायु, राम, रावण की मूर्तियाँ, हिन्दू और बौद्ध धर्म से सबन्धित अन्य वस्तुएं करीने से बनाकर सजाकर रखी गयी थी. चारों और स्केलेटर्स का जाल बिछा हुआ था. हवाई अड्डे के अन्दर गोल्फ कार्ट्स भी चल रही थीं. मुस्तैद सिपाही अपनी पैनी निगाह हर आने जाने वाले यात्री पर रखे हुए थे. क्योंकि इस हवाई अड्डे पर ड्रग पैडलर्स अक्सर पकडे जाते हैं. भारत से चलते समय मुझे उनसे सावधान रहने की ताकीद दी गयी थी.
हमने थ्रू चेक-इन कर रखा था इसलिए हैण्डबैग के अलावा किसी और चीज़ की चिंता नहीं थी. हमारा सामान अपने आप दूसरी कनेक्टिंग फ्लाईट में लोड कर दिया जायेगा. आप भी जब कनेक्टिंग फ्लाईट से जाएँ तो लगेज थ्रू चेक-इन ही कीजिये इससे आप बाकी के झंझटों से बच जायेंगे. कुनमिंग की फ्लाईट में अभी 4-5 घंटे थे तो इतना समय तो हमें ट्रांजिट में ही गुज़ारना था. तो शुरू हुआ सुवर्णभूम हवाई अड्डा घूमने का सिलसिला. एक छोर से दूसरे नज़र नहीं आ रहा था. हाँ हर मिनट हवाई जहाजों की गडगडाहट सुनाइ दे रही थी और सुनाई दे रहा था हजारों लोगों का शोर. हवाई अड्डे पर शराब की कई दुकाने थीं मैंने इतने नामचीन ब्रांड्स पहली बार एकसाथ देखे थे. एक फोटो तुरंत खिंचवा भी ली यादगार के तौर पर. 
एअरपोर्ट पर घूमते फिरते समय बीतने लगा और तभी हमारी फ्लाईट की उद्घोषणा भी हो ही गयी. उस समय सुबह भी करीब ही थी. सुबह का साढ़े तीन शायद बज रहा था. इधर उधर चढ़ते हुए हम लोग भी अपने प्रस्थान वाले गेट पर सिक्यूरिटी चेकिंग के लिए पहुँच गए. मैंने भी जूते, बेल्ट और वेस्ट पाउच खोलकर ट्रे में रखा और लाइन में लग गया मेरी जामा तलाशी हुई तो पूछा गया कि-इज़ इट योर वेस्ट पाउच? मैंने कहा यस इट्स माइन. वे बोले- प्लीज कम दिस साइड एंड ओपन इट. समथिंग ससपीशियस इन दिस. मैं सन्न रह गया.. कि यहाँ क्या हो गया अब क्या होगा. यही सब सोचते सोचते मैंने अपना वेस्ट पाउच उनके सामने खोल दिया. उसमे से लिक्विड बाम की एक छोटी सी शीशी मिली. वे बोले- व्हाट इज़ दिस. मैंने कहाँ- दिस इस लिक्विड बाम, ऐज़ आई एम माईग्रेन पेशेंट. इट रीलीजेज़ माई पेन. इतना सुनकर उन्होंने उसे सूंघा वूंघा और फिर संतुष्ट होकर मुझे जाने दिया. मैंने चैन की सांस ली. थोड़ी देर बाद हम लोग अपनी दूसरी फ्लाईट में सवार थे.
शेष अगले अंक में
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