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Saturday, September 29, 2018

मेरी इम्फाल यात्रा भाग 2: सुभाष चन्द्र बसु की यादें और तैरते टापुओं की झील


अगले दिन हम लोग टैक्सी से लोकटाक लेक के लिए निकल गए. ड्राईवर साहब हिंदी बोल और समझ रहे थे हमें कोई दिक्कत नहीं हुई. रास्ते में ड्राइवर साहब से पूछ ही लिया कि मणिपुर का यह नाम क्यों पड़ा. साहब इंटेलिजेंट थे बोले कि सर जैसा हमने पढ़ा है कि यहाँ के एक राजा भाग्यचन्द्र और उनके लोगों ने जो सिक्के चलाये उनपर मणिपुरेश्वर नाम लिखा था उसी के आधार पर यह नाम रख दिया गया. मैं उसके ज्ञान पर हैरान रह गया. बैगपैक से पानी की बोतल निकाली थोडा पानी पिया और हसीं नज़ारों को कैमरे में कैद करते हिचकोले खाती सड़क पर चलते रहे. करीब 1 घंटे की राइड के बाद हम लोग मोरंग पहुंचे. यही वह जगह थी जहाँ से नेता जी विश्व भ्रमण को निकले. नेता जी ने यहाँ से लम्बा सफ़र तय किया. उसी जगह पर एक म्यूजियम भी बनाया गया है. मैं थोड़ा भावुक हो गया. सरकार ने उनकी यादों को काफी सहेज कर रखा है लेकिन अजायबघर के ठीक सामने तमाम सारा गोबर भी था. आज़ाद हिन्द फ़ौज से जुडी उनकी तमाम चीज़ें यहाँ हिफाज़त से रखी हुई हैं जिन्हें देखकर दुःख और सम्मान दोनों का समेकित भाव आता है. मैंने नेता जी की मूर्ति को ज़ोरदार सैल्यूट किया और इत्मिनान से उस छोटे से म्यूजियम का भ्रमण किया. एक अलग वीथिका में मणिपुर के राजवंशों के राजाओं के फोटोज के साथ मुख्यमंत्री और राज्यपालों की भी तस्वीरें लगी हुई हैं.
ये चिट्ठी नेता जी ने बतौर आजाद हिन्द के सुप्रीम कमांडर होने के नाते लिखी थी. मैंने चुपके से फोटो खींची कि आप लोगों को दिखाऊंगा. राइटिंग तो बहुत समझ नहीं आ रही लेकिन उनकी है तो आत्मा श्रद्धा से भर उठती है. चिट्ठी को देखकर मुझे फैजाबाद के गुमनामी बाबा याद आ गये. मन कचोटता है कि आज़ादी का महानायक गुमनामी की मौत क्यों मरा. 
यहाँ से निकल कर हम लोग लोकटाक लेक के लिए निकल लिए. रास्ते के दृश्य DDLJ जैसे स्विट्ज़रलैंड की याद दिला रहे थे. थोड़ी ही देर में लोकटाक लेक दिखने लगी. झील से सटी हुई पहाड़ियां, उनकी घाटियों में मीलों फैली लम्बी हरी घास और धान के खेत, घास के मैदान के बीच में चरती हुई गायें. तीनों मिलकर एक कभी न भूलने वाला दृश्य खींच रहे थे. एक बात नोट करने योग्य कि कृष्ण भक्त होने की वजह से यहाँ मांसाहारियों को बीफ मुश्किल से मिलेगा, मीठे पानी की मछली बहुतायत में है.  लोकटाक लेक एक अद्भुत झील है यह दुनिया की एकमात्र फ्लोटिंग आइलैंड्स की झील है. दरअसल इसमें मोटे-मोटे नरकुल होते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में फुम्दी कहते हैं. यही नरकुल गोल घेरे में उगते हैं और तैरा करते हैं. 
इसका सबसे बड़ा आश्चर्य भी यही है. यह फुम्दी दो किस्म की है एक डूबी हुई यानी फुम्दी अरुप्पा और एक तैरती हुई मतलब फुम्दी एताबोया. इन्ही फुम्दियों के कारण इसे तैरती हुई झील का वैश्विक दर्ज़ा मिला हुआ है. यहाँ एक होटल भी है जिसमे कॉटेजेस हैं लोग आते हैं रात भर यहाँ रुकते हैं और सुबह सूर्योदय देखकर उसे अपनी आँखों में हमेशा के लिए बसाकर चले जाते हैं. हमने भी यही किया लेकिन रात में रुके नहीं लेकिन हमने सनसेट देखा. ज़बरदस्त था, जिसे कभी नहीं भूला जा सकता. लौटते समय हम डांसिंग डियर यानी शंघाई हिरन देखने के लिए पास ही स्थित कैबुल लामज़ो नेशल पार्क भी गए. कहते हैं कि सिर्फ भाग्यशालियों को ही हिरन दीखता है हम लोगों को उस दिन 5 डांसिंग डियर दिखे. लौटते समय रात हो रही थी क्योकि 4-5 बजे तक गोधूली होने लगती है. डूबते सूरज के साथ बादल रंग बदल रहे थे कभी काले कभी लाल तो कभी नारंगी. इन रंगों को देखकर लगा कि हम इंसानों में तो रंगों को लेकर भी लड़ाई होती है नारंगी मेरा हरा तेरा लेकिन यहाँ तो सभी सूरज के साथ एकसाथ डूब रहे हैं.
शेष अंतिम क़िस्त में जारी.....
अपनी रिवियुज़ मुझे ज़रूर लिखें.

Friday, September 28, 2018

मेरी इम्फाल यात्रा भाग 1: भारत का स्विट्ज़रलैंड मणिपुर


होटल के कमरे से सूर्योदय का खूबसूरत दृश्य
सितम्बर के महीने में इस बार कुछ दिनों के लिए मणिपुर जाना हुआ. मणिपुर मतलब आभूषणों की भूमि. जो देखने से लगता है. मणिपुर भगवान कृष्ण को मानने वालों की धरती है. अर्जुन ने यहाँ की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह कर इसे कृष्णमय कर दिया. हम मैदानी लोगों के लिए यहाँ सुबह उठना मुश्किल है क्योंकि सूरज जल्दी निकलता है और अस्त भी. लोगबाग सुबह 4 बजे ही उठकर नित्य कामों में लग जाते हैं. 8 बजे दुकाने खुल जाती हैं और शाम 6 बजे तक बंद. शाम के समय यहाँ भी भुरभुरी ठण्ड शुरू हो चुकी थी. चट्ट गोरे लोग, खूबसूरत लड़कियां और सुन्दर नज़ारे आपका मन मोहने के लिए काफी हैं. 
मैं कोलकाता से सीधी फ्लाईट के ज़रिये यहाँ पहुंचा. खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसा पर्वतीय शहर इम्फाल बहुत सुन्दर और साफ़ है.  इम्फाल नाम यम्फाल से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'कई गांवों की भूमि'पर यहाँ भी धीरे-धीरे कंक्रीट घुसपैठ कर चुकी है जो कि पर्वतीय पर्यावरण के लिए खतरा भी है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस राज्य में पोलो ईसा पूर्व 3000 सालों से खेला जा रहा है. देश-विदेश से पोलो के शौक़ीन यहाँ खींचे चले आते हैं.
इम्फाल का एअरपोर्ट 
 कई प्रजातियाँ और आदिवासी यहाँ सदियों से रह रहे हैं.  इनमे मणिपुरी ब्राहमण या वामन, पंगन, मुस्लिम, आदि भी यहाँ बहुतायत में मिलते हैं. इसके अलावा काबुईस, टांगखुल्स, और पाइते जनजातियां भी यहां पाई जाती हैं. शेष भारत की तरह यहाँ भी मुझे मारवाड़ी, पंजाबी, बिहारी और बंगाली लोगों को ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं हुई. हिंदी भाषी हैं तो दिक्कत नहीं होगी लोग ठीकठाक हिंदी जानते हैं. आपका काम नहीं रुकेगा. आसपास की बाज़ार में आपको थाईलैंड, बर्मा से आयातित सामान मिल जायेगा. इम्फाल का एअरपोर्ट आम यात्री विमानों के लिए 3-30 pm बजे तक खुला रहता है और इसके बाद इसे सेना ओवरटेक कर लेती है. सभी विमानन कंपनियों के लिए यह ज़रूरी है कि वे अपनी कम से कम 5 उड़ाने पूर्वोत्तर राज्यों के लिए देंगी क्योंकि यहाँ ट्रेन की कनेक्टविटी नहीं है. खांटी पूर्वोत्तर शैली का बना  इम्फाल हवाई अड्डा बहुत खूबसूरत दीख पड़ता है.

लोकटक लेक
हमारा जहाज जैसे-जैसे इम्फाल पहुँच रहा था वैसे-वैसे मेरी दिल की धड़कने तेज़ हो रही थीं. खिड़की से नीचे झाँकने पर दुनिया के आश्चर्यों में शुमार ‘लोकटक झील’ दिखाई दी. इसमें हरी घास के moving islands बने हुए हैं जो शाम होते होते लाल हो जाते हैं. इम्फाल का राजमहल 2004 तक असम राइफल्स के नियंत्रण में था और फिर यह राज्य सरकार के सिपुर्द कर दिया गया. मैं यहाँ ख्वैरामबंद बाजार, 'इमा मार्किट’ भी गया जिसका नियंत्रण पूरी तरह महिलाओं के ही हाथों हैं. इमा का शाब्दिक अर्थ माँ होता है. अगर आप भाग्यशाली हैं तो आपको कैबुल लामजो राष्ट्रीय उद्यान में शंघाई डियर (नाचने वाला हिरन) देखने को मिल जायेगा. मोइरांग, एंड्रो, सेकता आदि घूमने के लिए कई स्थान हैं. अन्य मंगोल लोगों की तरह यहाँ भी मार्केट और घर चलाने में सबसे बड़ा योगदान महिलाओं का ही है. वे अपना 100% देती है. 
इम्फाल पूर्वोत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण शहर है. यहाँ से बर्मा बॉर्डर लगभग 3.30 घंटे की दूरी पर स्थित है अगर सड़क सही हो तो महज़ दो घंटे. हम तो नहीं जा सके लेकिन लोगबाग बर्मा के अन्दर तक जाकर खरीदारी वगैरह करते हैं. इम्फाल के होटल क्लासिक ग्रांडे में हम लोग ठहरे थे वह यहाँ का एक महत्वपूर्ण होटल है. अगले दिन इसी होटल में आयुष्मान भारत योजना की लौन्चिंग भी वहीँ थी जिसकी वजह से सिक्यूरिटी बहुत टाइट थी. मणिपुर में होटल की खिड़की से बाहर पहाड़ियों का नज़ारा बहुत ही भव्य था जैसे ईश्वर ने इम्फाल को किसी ख़ास मकसद के लिए बनाया है. मुख्य सड़क पर weekdays में काफी भीड़ थी लेकिन अन्दर के इलाके बेहद शांत थे. मैं मैदानी इन्सान स्थानीय लोगों के लिए अजूबा नहीं था, क्योंकि यहाँ मणिपुर के लोग शेष भारत में रोज़गार की तलाश में जाते रहते हैं. पश्चिम बंगाल में अस्पताल, होटल आदि में ये आपको बहुतयात में मिलेंगे.
शेष अगले अंकों में.......


Sunday, September 23, 2018

21वीं सदी में तेज़ी से बदल रहा है कोलकाता

कोलकाता मेरा आना कई बार हो चुका है लेकिन इस बार उद्देश्य दूसरा है। लगातार गिर रहे पुलों की वजह से सिटी ऑफ जॉय का नाम यहां के स्थानीय निवासियों ने सिटी ऑफ भोय (भय का शहर) रख दिया है और आजकल यहां सोशल मीडिया इससे भरा भी रहता है। खैर इन सबसे दूर ऐन विश्वकर्मा पूजा वाले दिन मेरा यहां पदार्पण हुआ। उद्देश्य मेडिकल टूरिज्म है लेकिन जाना यहाँ से आगे भी है। कोलकाता पहले से काफी व्यवस्थित नज़र आ रहा है. देखकर अच्चा लग रहा है. ऊंची ऊंची इमारतें, बिजली के खम्भों पर सांप की तरह लिपटी LED लाइट्स और न जाने क्या क्या. लेकिन जो कुछ भी है वो आँखों को भरमा रहा है.
दुर्गा, सरस्वती, शनि और विश्वकर्मा के भक्त बंगालियों में इनका समन्वय दिखता भी है। मेरा यहां आना भी विश्वकर्मा पूजा पर ही हुआ चारों तरफ छोटे छोटे रंग बिरंगे पंडाल सजे हुए हैं। सड़कों पर नाच गाकर लोग खुशियां मना रहे हैं। साल्ट लेक स्टेडियम में दो मशहूर क्लबों के बीच एक मैच भी था जिसे देखने को पूरा शहर जैसे गुत्थम गुत्था था। मूर्तिकार और प्रसिद्ध लेखकों से यह शहर बाहर पड़ा है। पिछले कई सालों से ममता बंदोपद्ध्यय इसका सौंदर्यीकरण करने में जुटी हैं। उन्होंने यहां फ्लोटिंग मार्किट भी बनवाया है। जो बड़ी मोहक जान पड़ती है। हालाँकि पहले लोग ऐसे ही सब्जियां वगैरह बेचते थे पर फ्लोटिंग मार्किट बनने के बाद विक्रेता अन्दर नाव में बैठकर सामान बेचते हैं. सक्सेस रेट क्या है पता नहीं लेकिन सौन्दर्यीकरण हुआ है. यह ऐन पाटुली चौराहे पर ही है जहाँ से एक रास्ता गडिया को जाता है. पंडाल बनने शुरू हो चुके हैं. सड़क के दोनों किनारों पर विज्ञापनों के लिए बांस भी बांधे जा चुके है. इंतजार है तो बीएस पूजा का.
 नार्थ कोलकाता और साउथ कोलकाता में वही अंतर है तो चांदनी चौक और वसंत बिहार में है। कोलोनियल पीरियड की यादों से यह शहर पटा हुआ है। बर्तानिया शैली के घर और दुकाने आपको पुराने लंदन की याद दिला सकती हैं। मेट्रो का जाल धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल रहा है। जो सुदूर क्षेत्रों को आपस मे जोड़ रहा है। ट्रैफिक हद से ज़्यादा है लेकिन दिल्ली की तरह चोक नही करता। पुलों के बजाय ज़मीन के अंदर भी सड़कों की ज़रूरत महसूस होती दिखाई दे रही है। सुबह से ही वाहनों की चिल्लपों चालू हो जाती है. मजदूरों का कहा जाने वाला यह शहर लगता है अब अमीरों का हो रहा है.
गड़िया हाट घूमते हुए एक दुकान दिखाई दी जहां मंगोल देशों से आयात की हुई मोहक मूर्तियां और आर्टिफिशल फूल दिखाई दिए। भारत के बड़े शहरों में ये आमतौर पर दिख जाते हैं। भारतीय भगवान जो कि चीन या थाईलैंड के कारखानों में यहां के व्यापारियों के आर्डर पर बनते हैं। छोटे शहरों में जो डुप्लीकेट मूर्तियाँ मिलती हैं उनमें इतनी सफाई नहीँ दिखती। एक से एक खूबसूरत मूर्तियाँ, प्लास्टिक के पौधे. कम्बोडियन बुद्ध, चाइनीज़ बुद्ध, थाई बुद्धा, लाफिंग बुद्धा के तमाम प्रतीक. इन्ही में अपने गणेश लक्ष्मी और हनुमान. प्लास्टिक के इन पौधों को देखकर लगा कि क्या भविष्य इन्ही सबका है. आने वाली पीढियां असली पेड़-पौधों और जानवरों को देखने को तरस जाएँगी क्या.
हे भगवन ऐसा न हो वरना गजब हो जायेगा. खैर मैंने जोर से अपना सिर झटका और इस मायाजाल से बाहर निकला. अगल बगल दूकाने सजी हुई थी. फूटपाथ पर रोज़मर्रा के सामान से लेकर उपहार में देने लायक गिफ्ट्स मिल रहे थे. लेकिन लगेज भारी होने के डर से कोई सामान लेने की हिम्मत न हुई.
शहर का सौंदर्यीकरण अभी भी जारी है। फुटपाथों को हरा भरा बनाया जा चुका है। जगह-जगह दुर्गा पूजा पंडाल के ढांचे खड़े हो चुके हैं बाजार में पूजा सेल लग चुकी है पर अभी भीड़ उतनी नही है जल्दी ही लोगबाग पूजा की खरीददारी को निकलेंगे तब चारों तरफ सिर्फ सिर ही सिर दिखेंगे। बंगाली दुर्गा पूजा बड़े उत्साह से मनाते हैं. उनके लिए दुर्गा पूजा मतलब आनंद, उत्सव, नाचगान और खानपान. इससे कम कुछ नहीं. इसके ठीक बाद आपको पूरे भारत में बंगाली घुमते हुए नज़र आयेंगे क्योकि ब्नागल में पूजा की लम्बी छुट्टियाँ होती हैं और वे निकल लेते हैं टूर पर. दूकानों की खरीदारी धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है. जब उत्तर भारत पित्र पक्ष में तर्पण कर रहा होता है तब बंगाल पूजा की खरीददारी में दुकानदार को दाम अर्पण कर रहा होता है। और हां भाजपा समर्थकों के लिए खुशखबरी है कि आम जन से बात करने पर पता चला कि इस बार स्थिति मजबूत है और दीदी को कठिन चुनौती मिलने वाली है। आमजन इसबार भाजपा के बारे में बात करता हुआ नज़र आ रहा है.
ये है कोलकाता की प्रसिद्द मिठाई की दूकान जिसका मुख्यालय भवानीपुर में है यह करीब 125 साल से भी ज्यादा पुराणी दुकान है. इनके यहाँ रोस्टेड दही, रोस्टेड गुलाब जामुन जामुन जैसी नायब मिठाइयाँ खाने के लिए मिलती हैं. कोलकाता में इसकी कई शाखाएं हैं. इस दूकान में नेताओं के नाम के भी सोंदेश मिलते हैं. मैंने तो रोज़ सन्देश लिए वैसे मुझे रोसोगुल्ला बहुत पसंद है. तमाम तरह की चौकलेट में लिपटी मिठाइयाँ भी हैं जो शेष भारत में आपको नहीं मिलेंगी. वैसे भी खानपान हर शहर का अलग ही है. मलिक मोशाय की दुकान का भ्रमण कीजिये और फिलहाल आनंद लीजिये, मुझे आगे जाना है।