कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र हिंदी साहित्य में ज़मीन से जुडी हुई कहानियाँ लिखने के महारथी थे. ऎसी अनेक कहानियां हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और लोगों की जुबान पर चढ़ी हुई हैं. मुंशी प्रेमचंद्र का नाता अवध की राजधानी लखनऊ से भी लम्बे समय तक रहा. आज 31 जुलाई मुंशी जी की जयंती है. आइये जानते हैं लखनऊ में वे कब तक और किन जगहों से जुड़े रहे. लखनऊ की मारवाड़ी गली, लाटूश रोड पर होमियोपैथी के डॉक्टर पाठक और डॉ. कृपा शंकर निगम का मकान ऐसी कई जगहें हैं जो उनसे सीधे सीधे जुडी हुई हैं. प्रेमचंद्र की जिंदगी और उनके साहित्य पर पिछले 28-30 वर्षों से शोध कर रहे डॉक्टर प्रदीप जैन बताते हैं कि यूं तो प्रेमचंद्र जी कई शहरों में रहे पर लखनऊ से उन्हें खास लगाव रहा. मुंशी प्रेमचंद्र ने 1921 में सरकारी नौकरी छोड़कर लखनऊ आ गए. जहां उन्होंने दो बार नौकरी की. पहली ‘गंगा पुस्तक माला’ में 100 रुपये महीने की तनख्वाह पर बतौर साहित्यिक सलाहकार तथा दूसरी मुंशी नवल किशोर प्रेस की मैगजीन माधुरी में बतौर संपादक. गंगा पुस्तक माला के दुलारे लाल भार्गव के आग्रह पर ‘रंगभूमि’ का प्रकाशन गंगा पुस्तक माला में करवाया. जिसमे रायल्टी के तौर पर मुंशी जी को 1,800 रुपए मिले. इस कालजयी किताब का पहला प्रिंट आर्डर ही 5000 कॉपी का था. इसी दौरान सितंबर 1924 में वे लाटूश रोड़ पर किराए के माकन में रहे. नवंबर में वहीं नाटक ‘करबला’ लिखा जिसने उस वक्त खूब ख्याति कमाई. अगस्त 25 में दुलारे राम मनभेद के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
मुंशी नवल किशोर प्रेस उन दिनों एक जाना माना प्रेस था. उनकी मैगजीन ‘माधुरी’ के संपादक के तौर पर नौकरी कर ली. जिसमे माधुरी की प्रिंट लाइन में उनका नाम पंडित कृष्ण बिहारी के साथ संयुक्त रूप से जाता था. इस दौरान वे अमीनाबाद के झंडे वाला पार्क के पास व गनेशगंज में रहे. फरवरी 1931 में ‘माधुरी’ के संपादन को उन्होंने छोड़ दिया. पर वे लखनऊ में बने रहे. वे वाराणसी के साप्ताहिक अखबार ‘जागरण’ को लखनऊ से रोजाना निकालने की योजना में लग गए. हालांकि स्वास्थ्य के कारण उनकी यह योजना सफल न हो पायी.
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| रिफाह ए आम क्लब |
10 अप्रैल 1936 को लखनऊ के रफे आम क्लब में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता भी उन्होंने की. दो दिन पहले ही इसके लिए वे यहां आ गए. सज्जाद जहीर के मकान ‘वजीर मंजिल’ पर वे जैनेंद्र कुमार के साथ रुके. उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था. 25 जून 1935 को उन्हें खून की पहली उल्टी हुई, उसके ठीक एक महीने बाद 25 जुलाई को दूसरी. जिससे बाद से वे और ज्यादा बीमार रहने लगे. इलाज के लिए वे लखनऊ आ गए. शुरुआती दो महीने लाटूश रोड पर कृपा शंकर निगम के मकान और फिर अमीनाबाद के सूर्य होटल में ठहरे.
वरिष्ठ साहित्यकार व लेखक रामकृष्ण जी लिखते हैं ‘आज भी वर्ष 1927 की एक डायरी के 29 नवंबर के पृष्ठ पर अंकित मिलता है कि, बच्चे (मतलब रामकृष्ण जी) के पैदा होने पर बाबू प्रेमचंद्र ने दस रुपये उस पर न्यौछावर किये. प्रेमचंद्र जी उन दिनों लखनऊ में ही रहते थे. हमारे अपने घर के बाहरी हिस्से में एक किराएदार के रूप में. तब वे मुंशी नवल किशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित होने वाली माधुरी नामक पत्रिका का संपादन कर रहे थे. अपने उपन्यास रंगभूमि का लेखन उन्होंने हमारे घर में रहते हुए ही किया था.’
(साभार: अमर उजाला ३० जुलाई २०१३)

