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Thursday, June 24, 2021

लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतें और उनमें सरकारी दफ्तर

समय के साथ लखनऊ ने बहुत से बदलावों को देखा है. लेकिन एक चीज़ जो न बदली वो है लखनऊ की इमारतें. लखनऊ वैसे तो राम कालीन शहर है लेकिन यहाँ का स्थापत्य नवाबी काल का ही है. नवाबी काल में नवाबो और अंग्रेजों ने लखनऊ में कई सिग्नेचर बिल्डिंग्स का निर्माण करवाया. आज़ादी के बाद सरकार ने इन इमारतों में अपने दफ्तर खोल दिए. आज कुछ को बेहतर रख रखाव के लिए ASI के सिपुर्द किया जा चुका है जबकि कुछ में अभी भी दफ्तर चल रहे हैं. आइये आज एक सैर ऐसी ही कुछ इमारतों की जो एक वक़्त लखनऊ की सरज़मीं से आसमान को बड़े गर्व से निहारा करती थीं और इतराती थीं अपने खूबसूरत नैन नक्श पर.

ये ईमारत अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में जानी जाती है. इस ईमारत को आप लोग ज़रूर पहचानते होंगे. जी हाँ आज की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी और कल का मच्छी भवन. हालाँकि 1857 के प्रथम विद्रोह में यह लगभग नष्ट हो गया था. साल 1590 में इसका निर्माण अवध के शासक शेख अब्दुर्रहीम ने करवाया था. जिसे बाद में नवाब सफदरजंग ने पुराने भवन की दीवार की मरम्मत करवाकर मजबूती देकर फिर से इसका नाम मच्छी भवन रखा. 1857 की ग़दर में यहाँ रखा गोला बारूद क्रांतिकारियों के हाथ न लगे इसलिए अँगरेज़ कमांडर ने उसे आग लगाकर उड़ा दिया था जिसमे मच्छी भवन नष्ट हो गया था.

इस ईमारत का लोकप्रिय नाम है छतर मंजिल. जिसमे कुछ साल पहले तक सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया CDRI का ऑफिस था. CDRI का काम दवाओं पर रिसर्च करना है. आज यह एक संरक्षित ईमारत है. इस छतर मंजिल को कोठी फरहत बख्श और अम्ब्रेला पैलेस भी कहते हैं. इसे 1781 में जनरल क्लाउड मार्टिन ने बनवाया था जिसे बाद में नवाब सआदत अली खान ने खरीद लिया था, और इसके बाद  नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने इसमें बाकी निर्माण करवाया. इधर खुदाई में इसमें तमाम सुरंगे मिलीं जो सीधे गोमती नदी से जुड़ती हैं. ये सुरंगे शायद कोठी को ठंडा रखती होंगी.

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ये लाल बरदारी है जिसमे अब राज्य ललित कला अकादमी का दफ्तर है. ये भी केसरबाग में है. इसका निर्माण सआदत अली खां ने सन 1798-1814 के बीच करवाया था. इसे कस्र उल सुलतान के नाम से भी जाना जाता है. इसका इस्तेमाल शाही दरबार या राज्याभिषेक के उत्सवों के लिए किया जाता था. अवध की अमीरी और अंग्रेजों के लूटने का आलम ये कि इसमें चालीस मन चांदी (एक मन बराबर चालीस किलो) का रत्नजड़ित सिंहासन था. अँगरेज़ उसे तो लन्दन ले गए और यहाँ नवाब साहब को लकड़ी की नक्काशीदार कुर्सी दे गए कि इस पर बैठ कर आप जंचते है.

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इस ईमारत में अब आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया यानी ASI का दफ्तर था. यह है कैसरबाग में स्थित कोठी रोशनउद्दौला. इसका निर्माण आज से करीब 200 साल पहले अवध के दुसरे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के वज़ीर रोशनुद्दौला द्वारा करवाया गया था. जिसे बाद में वाज़िद अली शाह ने अपनी बेगम का महल बना दिया था.

200 साल पुरानी इस ईमारत में अब उत्तर प्रदेश के महामहीम राज्यपाल रहते हैं. YH HAI कोठी हयात बख्श. हयात बक्श मतलब ज़िन्दगी देने वाली. अब यह राज भवन है. इसका भी निर्माण जनरल क्लाउड मार्टिन ने ही करवाया था. जब मेजर जॉनशोर बैंक अवध के कमिश्नर बने तब वे यहीं रहते थे जिस वजह से कुछ वक्त तक इसे बैंक कोठी भी कहा गया. वर्तमान में यहाँ से हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की सियासत के सर्वेसर्वा विराजते हैं. यानी महामहिम राज्यपाल.
ईमारत में अब भारतीय स्टेट बैंक की मुख्य शाखा का दफ्तर है. तारे वाली कोठी कहते हैं इसे जो कि के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम के ठीक पीछे बनी हुई है. इसका निर्माण सन 1831 में नवाब नसीर-उद-दीन हैदर ने शाही प्लेनेटोरियम  के वास्ते स्पेस स्टडी के लिए करवाया था. उनका यह भी मानना था कि इससे युवा दरबारियों को अन्तरिक्ष के बारे में जानकारी मिलेगी. हालाँकि इसका पूरा निर्माण नसीर उद दीन हैदर की ज़िन्दगी में न हो सका और हैदर के चाचा ने करीब 19 लाख रूपए खर्च करते हुए 1841 में इसे पूरा करवाया. यह भव्य ईमारत आज बैंक के कामकाज से गुलज़ार है.

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इस ऐतिहासिक ईमारत को हम लखनऊ जीपीओ के नाम से जानते हैं. आज़ादी से पहले यह अंग्रेजों का रिंग थिएटर था. जहाँ ब्रिटिश परिवार मनोरंजन के लिए आते थे. यहाँ इंग्लिश नाटक भी खेले जाते थे. इस कैंपस में एक क्लॉक टावर भी है जिसके घंटे की आवाज़ दूर तक जाती है. इस ईमारत के मेन गेट पर लिखा था कि DOGS AND INDIANS ARE NOT ALLOWED. सुप्रसिद्ध काकोरी ट्रेन डकैती के नामजद क्रांतिकारियों पर मुक़दमे की कार्यवाही के लिए इसे कोर्ट रूम में तब्दील कर दिया गया था.

से यहाँ से बड़े बड़े संगीतकार संगीत सीखकर निकले हैं. जी हाँ ये है भातखंडे म्यूजिक डीम्ड युनिवेर्सिटी. वाज़िद अली शाह की बनवाई इस ईमारत को  परीखाना कहते थे. ये कैसरबाग में सफ़ेद बरदारी के ठीक बगल में है. यहाँ लड़कियों को नृत्य संगीत की शिक्षा दी जाती थी. लड़कियां मतलब वाजिद अली शाह की परियां. लेकिन 1926 में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे, राय उमानाथ बली और राय राजेश्वर बली की कोशिशों से यहाँ एक संगीत विद्यालय की स्थापना की गयी. जिसका उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर सर विलियम मैरिस ने किया था इसलिए उन्ही के नाम पर इसे मैरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक कहा जाने लगा लेकिन २६ मार्च १९६६ में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका नाम भातखंडे हिन्दुस्तानी संगीत विद्यालय कर दिया.
इस ईमारत से उत्तर प्रदेश की सरकार चलती है जी हाँ ये हैं विधान भवन. जहाँ प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत लगती है. इसका निर्माण १९२२ में सर हरकोर्ट बटलर ने शुरू करवाया था. पहले यह अँगरेज़ सरकार का काउंसिल हाउस था जहाँ से आगरा अवध यूनाइटेड प्रोविंस की सरकार चलायी जाती थी और अब उत्तर प्रदेश की.

चंद खामोशियाँ मेरे हिस्से लिख कर,

वो चली गयी मेरी पेशानी पर एक किस्सा लिख कर...

आपके रिव्युज़ का इंतज़ार रहेगा..

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