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Thursday, October 4, 2018

मेरी इम्फाल यात्रा भाग 3 (अंतिम'): यहाँ इमा यानी माँ मार्केट भी है

अपनी यात्रा के अंतिम दिन हम लोग खरीदारी करने  निकले. पता चला कि यहाँ इमा मार्केट में ज़रूरत की सारी चीज़ें मिल जाएँगी. सोचा इमा कोई जगह होगी जिसके नाम पर इस बाज़ार का नाम पड़ा होगा लेकिन मैंने जब पता किया तो मालूम पड़ा कि मणिपुरी भाषा के इमा शब्द का मतलब है माँ, तो इमा मार्केट मतलब माँ मार्केट या मदर्स मार्केट. मैंने सोचा की चलो लोगों से इसका थोडा इतिहास पता किया जाए, मालूम करने पर मुझे अपने थोड़े शब्द पर हंसी आई क्योंकि यह बाज़ार तो 16 वीं सदी से अस्तित्व में है और यह विश्व का एकमात्र ऐसा बाज़ार है जिसका प्रबंधन पूरी तरह से महिलाओं के ही हाथ में है. 
इस बाज़ार का निर्माण सन 1533 में किया गया था. इसके पीछे एक बड़ी ही रोचक कहानी भी है कि आज से 500 साल पहले जब मणिपुरी पुरुष चावल के खेतों में काम करने जाते थे तो औरतें घरों में अकेले बचती थीं. उन्होंने अपने खालीपन को दूर करने के लिए महिलाओं का यह बाज़ार शुरू कर दिया. धीरे-धीरे इसका नाम ही इमा बाज़ार पड़ गया. इस समय यहाँ 3 हज़ार से ज्यादा महिलाएं बाज़ार में अपनी दुकानें चलाती हैं, जिसमे पारंपरिक मछलियों से लेकर चावल, कपड़े, खाना, पूजा का सब मिल जाता है पुराने समय में जहाँ महिलाएं लकड़ी के तखत पर सामान बेचती थीं वहीँ अब उनके लिए पक्के सीमेंटेड प्लेटफार्म बनवा दिए गए हैं. 
मैंने एक बात और नोटिस की कि जहाँ बाकी बाज़ारों में दूकानदारों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा रहती है वहीँ यहाँ औरतें एक दुसरे की मदद कर रही थीं. वे दूसरी महिला दूकानदारों का सामान बिकवाने में भी उतनी दिलचस्पी ले रही थी जितना खुद का. वे बड़ी ही सहृदयता से आपको दूसरी दूकान पर भेज देती हैं और ज़रूरत पड़ने पर वहां से आपके लिए सामान भी ले आयेंगी जिससे ग्राहक को दिक्कत न हो. सभी महिलायें कृष्ण की ही भक्त थीं क्योंकि सबने नाक से लेकर माथे पर लम्बे-लम्बे टीके लगा रखे थे. और कुछ तो चाय पीते-पीते लूडो भी खेल रही थी. 
मैंने देखा कि थाईलैंड और बर्मा से आयातित फलों की कई वैरायटी यहाँ आपको मिल जाएगी मसलन पैशन फ्रूट, या आम. पैशन फ्रूट को बॉडी वेट कम करने के लिए भी खाया जाता है यहाँ 50 रूपए किलो था क्योकि इसे यहाँ काफी मात्रा में इसकी खेती की जाती है जबकि शेष भारत में बहुत ऊंचे दाम में मिलेगा. पैशन फ्रूट को कृष्ण फल भी कहते हैं. इसमें भरपूर मात्र में विटामिन सी होता है. मैंने खाया तो मेरे दांत खट्टे हो गए. मैं दंग रह गया महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे इस मार्केट को देखकर. पहाड़ी अदरख, हल्दी जैसी बहुत सी चीजें देखने को मिली. एक अनोखी चीज़ कि कुछ महिलाओं ने न्यू करेंसी की दूकान भी लगा रखी थी और वे इस बात से निश्चिन्त थी कि कोई चोरी नहीं करेगा. क्योंकि एक और करेंसी रखी थी और दूसरी ओर मूंह घुमाकर वे खाना खा रही थी. नए-नए नोट वे भी खुलेआम. वाह भाई यही तो है मणिपुर.
अपने होटल में काले चावल की खीर खाकर मेरा मन प्रसन्न हो गया और मैं खोज में लग गया कि क्या यह चावल अलग से मिलेगा. यहीं इमा मार्केट में मेरी यह जिज्ञासा भी समाप्त हो गयी यहाँ मिला मुझे "चाक हाओ (सेंटेड काला चावल)". जो सिर्फ 100 रूपए प्रतिकिलो के हिसाब से उपलब्ध था. जबकि शेष भारत में आपको यह 1800 रूपए प्रतिकिलो या इससे ज्यादा के भाव में मिलेगा. इस चावल में पोषक तत्वों की मात्रा अन्य चावलों की अपेक्षा बहुत ज्यादा है इसमें एंटीओक्सिडेंट भरपूर हैं. फ़िलहाल  मणिपुर सरकार का कृषि विभाग इस चावल की ब्रांडिंग में जुटा हुआ है. एक वृद्ध महिला दूकानदार को देखकर मन हुआ की उनकी तस्वीर ली जाए. वे थोड़े से फल और कुछ पूजा का सामान बेच रही थीं. जैसे ही मैंने अपना कैमरा उनकी ओर घुमाया वे अलर्ट होकर पोज़ देने लगीं और दो तीन तस्वीरें बिना किसी ना नुकुर के खिंचवा ली जैसे ही मैं आगे बढ़ा उन्होंने आवाज़ देकर बुलाया और अपनी भाषा में मुझसे कहा कि मेरी तस्वीर दिखाओ. मैं आश्चर्यचकित रह गया.
मैने उन्हें उनकी सारी तस्वीरें दिखाई तो वे अपनी खूबसूरत तस्वीरें देखकर शर्म से मुस्कुरायीं और उन्हें देखकर हम सब भी मुस्कुराने लगे और फिर हाथ हिलाते हुए आगे बढ़ गए. यहाँ से पैशन फ्रूट, अदरख वगैरह लेकर हम सब वापस लौटने लगे तो मेरे झोले में मेरे साथ थीं मणिपुर की मुट्ठी भर यादें जिन्हें मैं बिना खरीदे ले जा रहा था. ये सोचकर कि अगली बार कभी आने पर खर्च करूँगा. सन्डे की वजह से ट्राफिक कम था लेकिन मेहनतकश मंगोल काम में फिर भी व्यस्त थे. मेरे हवाई जहाज का टाइम हो रहा था. छोटा सा एअरपोर्ट आज काफी बिजी था भीड़ बहुत थी मैं वापस लौटने के लिए उत्सुक था. मणिपुर जाने के लिए दिल्ली कोलकाता से सीधी हवाई सेवा है. वहां सस्ते और मंहगे दोनों प्रकार के होटल्स भी हैं. मुनासिब होगा कि आप टूर पैकेज लेकर जाएँ.

बदल रहा है कोलकाता (बोल दुग्गा माँ की जय अंतिम भाग)


कुछ साल पहले साम्यवादी सरकार में जीदबाद जीदबाद के नारों और मजदूर संघों से पहचाना जाने वाला कोलकाता अब धीरे धीरे बदल रहा है. पुरानी इमारतों की जगह नयी बिल्डिंग्स ले रही हैं. लम्बे और ऊंचे फ्लाईओवर्स हैं, चमचमाती सड़कें तो क्रम से खड़े लोग. मुझे लगा ही नहीं कि ये 5 साल पहले वाला कोलकाता है. ममता सरकार ने सड़क किनारे बेकार पड़ी ज़मीन पर सुन्दर सुन्दर क्यारियां बनवा दी हैं जिनमे हजारों की संख्या में फूल के पेड़ लगे हैं. बांस से बने उनके बैरिकेट्स उन क्यारियों की खूबसूरती को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. लेकिन नहीं बदली है तो काली मंदिरों के बाहर रंगीन और ताज़े फूलों की मालाएं, भक्तों की कतारें और माथा टेकते लोग. जब सड़कें चौड़ी न हो सके तो वहां फ्लाईओवर बनवा दो, इसी फलसफे पर सरकार ने पूरे शहर में कई नए बड़े और लम्बे फ्लाईओवर्स बनवाएं हैं जिनसे जाम की समस्या से निपटने काफी मदद मिली है. सर्जेंट्स मुस्दैती से ट्रैफिक के नियमों का पालन करवाने में लगे तो रहेते हैं लेकिन उसी में थोडा अपना भला भी कर ही लेते हैं. पूरे कोल्कता में इस समय नए होटल्स की बहार है और जो पुराने हैं उनका भी रेनोवेशन बड़ी तेज़ी से हो रहा है. लन्दन की बिग बेन का एक मॉडल भी बीचोबीच बनवाया गया है क्योंकि कोल्कता दो संस्कृतियों से बहुत ज्यादा प्रभावित है पहली तो चाईनीज़ और दूसरी ब्रिटिश. आर्किटेक्चर और रहन सहन भी इन्ही दोनों के बीच का देखने को आपको मेल जायेगा. चूँकि दुर्गा पूजा ख़त्म हो चुकी थी तो हमें देखने को उखड़ते पंडाल और विसर्जित होती मूर्तियाँ ही मिलीं. इसीलिए मैंने सोचा कि अगली बार पूजा के समय अही आऊंगा और कोशिश करके आपको लाइव कोलकाता दिखाने की कोशिश करूँगा.
तब बोल दुग्गा माँ की जय