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Monday, November 2, 2020

Lucknow in the first war of independence 1857 (1857 की ग़दर में लखनऊ)

अक्सर लोग इस वहम में रहते हैं कि लखनऊ महज़ रंगीनियत का नाम है. यहाँ सिर्फ शराब, शबाब, नवाब और कबाब के ही चर्चें हैं जबकि ऐसा नहीं है. लखनऊ ने वक़्त आने पर बड़े से बड़ा बलिदान भी दिया है. बात 1857 के दौर की है जब भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी के ज़ुल्मों से समूची मानवता त्राहि त्राहि कर रही थी. ऐसे में जब मेरठ में भारतीय सैनिकों को गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस दिए गये तो उनमे रोष फ़ैल गया. वे विद्रोह पर आमादा हो गए.  हालांकि दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में अंग्रेजों से भारत की आज़ादी के लिए योजना तैयार कर ली गयी थी. अवध में जिसका नेतृत्व नवाब वाजिद अली शाह की बीवी 'बेगम हज़रत महल' के हाथ में था. आखिरकार 10 मई 1857 को मेरठ से विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी. अवध की बेगम हज़रत महल एक मंझी हुई नेता के अलावा वीर योद्धा भी थीं. उन्होंने लखनऊ में विद्रोह की कमान सम्हाल ली. इस वक़्त वे अकेली थीं क्योंकि बादशाह वाजिद अली शाह को अँगरेज़ गिरफ्तार कर कलकत्ता के मटिया बुर्ज में कैद कर चुके थे. लखनऊ इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण था कि कंपनी के सामने अँगरेज़ अधिकारीयों ने अफगानिस्तान युद्ध से भी बड़ी संख्या में सैनिकों की मांग अवध में लड़ाई के लिए रखी थी.

आज चिनहट लखनऊ का एक दूरस्थ इलाका है लेकिन 30 जून 1857 को लखनऊ में चिनहट की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. चिनहट ने इस दिन इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवा लिया था. यहाँ विद्रोहियों ने लगभग 200 अँगरेज़ सैनिकों को मार गिराया और 5 तोपें उनके कब्ज़े में आयीं. चिनहट में बर्तानिया सैनिकों को धुल चटाने के बाद उत्साहित विद्रोही केसरबाग स्थित रेसीडेंसी आ गए. इस रेजीडेंसी की दीवारें 1857 के विद्रोह को कभी न भूल पाएंगी. इसी बेली गार्ड या बेली गारद में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. उन्होंने लगभग 600 अंग्रेजों को यहाँ बंधक बनाकर रखा और अंग्रेज बच न पायें इसलिए बाहर  से गोलियां और गोले बरसाते रहे. रेसीडेंसी आज भी लखनऊ में 1857 की ग़दर का के उन गवाहों में से एक है जो जिंदा हैं. ये याद दिलाता है कि किस तरह बागियों ने भारत की आज़ादी की नींव रखी.

16 नवम्बर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. यहाँ वीरांगना ऊदा देवी बड़े साहस और दिलेरी से लड़ी. वे नवाब की सेना के महिला दस्ते में थीं. उन्होंने मरदाना वेश बनाकर और यहीं एक पेड़ पर चढ़कर 32 अँगरेज़ सिपाहियों को मार गिराया. अँगरेज़ उनसे इतना भयभीत हो गए कि महल में घुसते समय उन्होंने उनका पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. दिलकुशा कोठी कभी नवाबों और अंग्रेजों की आरामगाह थी लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद इसको क्रांतिकारियों ने अपना ठिकाना बना लिया था. लेकिन जैसे जैसे विद्रोह दबता गया वैसे अँगरेज़ हावी होते गए और एक दिन उन्होंने इस कोठी पर भारी गोला बारूद बरसा कर विद्रोहियों को मार कर इस पर कब्ज़ा कर लिया.

1857 की ग़दर में बेगम हज़रत महल ने आज़ादी की लड़ाई अवध के एक किले मूसा बाग़ में लड़ी थी. यहाँ आलमबाग को जीतकर अंग्रेजों ने धावा बोल दिया था. लेकिन यहं अँगरेज़ कैप्टेन वेल्स को मार दिया गया था जिसकी मजार यही पर है. और अब लोग उस पर सिगरेट का चढ़ावा चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं. बेगम हज़रत महल लड़ी पुरजोर लड़ी लेकिन आखिर में पस्त हो गयीं और अपने बचे खुचे सिपाहियों के साथ नेपाल में शरण ली. अवध पर दुबारा कब्ज़ा करने के लिए कंपनी को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ा था और यही एक आखिरी रियासत थी जिसे उन्होंने सबसे आखिर में दुबारा हासिल किया था. अवध में विद्रोह का नेतृत्व करने वाली बेगम हज़रत महल की कब्र पडोसी मुल्क नेपाल में ही है. लेकिन वहां उनकी शहादत पर मेला नहीं लगता. जबकि मैंने सुना था कि
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा,

आपकी प्रतिक्रियायों का इंतजार रहेगा.

#rohittherainbow 

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