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Monday, November 2, 2020

Gates of Lucknow (लखनऊ के दरवाज़े)

नमस्ते दोस्तों, 

हम फिर हाज़िर है लखनऊ के बारे में एक नया रोमांचक एपिसोड लेकर. दरवाज़े घर ही नहीं बल्कि शहर की भी शान होते हैं क्योंकि ये शहर की भव्यता का प्रतीक होते हैं. अवध की नयी राजधानी दिल्ली से कम नहीं थी. लखनऊ में भव्य दरवाज़ों का इतिहास रहा है हम यहाँ कोशिश करेंगे कि आपको लखनऊ के प्रमुख दरवाज़ों से रूबरू करवाया जाए. आइये मेरे साथ खटखटाते हैं लखनऊ के दरवाज़ों को.  

लखनऊ के नक्खास क्षेत्र में बना ये दरवाज़ा अकबरी दरवाज़ा कहलाता है. अकबर की ताजपोशी के बाद लखनऊ में उसके नाम से एक दरवाज़ा बनवाया गया. जिसे अकबरी दरवाज़ा कहा गया. अकबरी दरवाज़ा दिल्ल में शहंशाह अकबर की ताजपोशी के दौरान बनवाया गया था. सन् 1528 में बाबर ने लखनऊ को अपनी हुकूमत में ले लिया था, जबकि इससे पहले शर्की राज्य जौनपुर के शासक लखनऊ पर अपनी सल्तनत का सिक्का जमाए हुए थे. मुगल बादशाह हुमायूं के बाद शेरशाह सूरी ने लखनऊ को अपने अधिकार में लिया और एक टकसाल अकबरी दरवाजे के भीतर कायम की. अकबर के बादशाह बनने के बाद लखनऊ का भाग्य चमका. लखौरी ईंट से बना यह दरवाज़ा ईरानी शैली का बना है हालाँकि जिसका कोई वास्तु सौंदर्य नहीं है बस यह लखनऊ में मुगलिया सल्तनत का एकमात्र गवाह भर है. कहते हैं कि गुनाहगार का सिर कलम कर धड़ इस दरवाज़े पर लटका दिया जाता था और सिर पास ही नाले में फेंक दिया जाता था. इस वजह से यह नाला भी "सिर कटा नाला" के नाम से जाना गया.

    अकबरी दरवाज़े के दूसरे छोर पर बना है गोल दरवाज़ा. जिसका निर्माण वजीर बेगम ने करवाया था. अकबरी गेट और गोल गेट के बीच कभी हुस्न का बाज़ार सजता था. आज यहाँ सर्राफा है. सोने चांदी के भव्य शो रूम्स हैं. इसके अन्दर की गलियों से ठक-ठक की आवाज़ आने का मतलब यहाँ चांदी का वर्क कूटा जा रहा है. यहाँ कभी लखनवी तमीज और तहजीब का बोलबाला था. इस बाजार में गोटे-किनारी की तमाम दुकानें हैं, अत्तारों की दुकानें हैं, इस तरह यहां सोने-चांदी की चमक-दमक, चिकन के कारखाने, फूलों की मंडी, जरी-कामदानी के कारीगर और गाने-बजाने नाचने वालों के घराने एक साथ मिलते हैं.

       रूमी दरवाज़े जैसी भव्यता का कोई दूसरा दरवाज़ा पूरे भारत में नहीं है. जो कि बड़े और छोटे इमामबाड़े के बीचोबीच हरदोई रोड पर स्थित है. जानकारों का मानना है कि इसे नवाब आसफुद्दौला ने अवध में भीषण अकाल के दौरान 1784-86 में बनवाया था. इसे इंडोपर्शियन शैली में बनवाया गया है. हालाँकि वरिष्ठ इतिहासकार पी.एन. ओक इसे लक्षमणपुरी का "राम दरवाज़ा" बताते हैं. जिसे नवाबो ने रूमी नाम दिया. रूमी दरवाज़े के टॉप पर बनी बुर्ज़ी से गोमती का नज़ारा बहुत ही अद्भुत दिखता था. हम तो खूब चढ़े हैं इस पर. अब सरकार ने रख-रखाव और खतरे को देखते हुए इसे बंद कर दिया है.

चौलाखी या लाखी दरवाज़ा जिसे चाइना बाज़ार दरवाज़ा भी कहा गया. यह दरवाज़ा कैसर बाग़ की चौलक्खी कोठी में बना हुआ है. यह केसरबाग महल का पूर्वी दरवाज़ा भी है. जिसका निर्माण 1848-1850 के नवाब मध्य वाजिद अली शाह ने करवाया.  परीखाना नवाब वाजिद अली शाह का की रानियों का हरम था. लाखी दरवाज़ा इस दरवाज़े के ठीक सामने बना हुआ है. ये दोनों दरवाज़े जुड़वाँ हैं. दोनों का निर्माण एकसाथ किया गया. लाखी दरवाज़ा केसरबाग में सफ़ेद बरदारी के ठीक पीछे बना हुआ है. ये दरवाज़ा गवाही है कि इसी के नीचे से गुज़रते हुए नवाब वाज़िद अली शाह को कलकत्ते ले जाया गया. जहाँ के विलियम फोर्ट से वे कभी वापस लखनऊ न आ सके.

नसीरुद्दीन हैदर के बनवाए इस दरवाज़े को केसरिया फाटक कहते हैं. ये लखनऊ के ग्लोब पार्क के दक्षिण में बना हुआ है. अब यह उपेक्षित है जबकि इससे 1857 की क्रांति की यादें भी जुडी हैं. इसका एक नाम नाम शेर दरवाज़ा भी है. 1857 के विद्रोह में  एक अंग्रेज़ ब्रिगेडियर जनरल नील को यहाँ मार दिया था जिसके बाद इसे इसे नील गेट भी कहा जाने लगा. शेर दरवाज़ा आज भी शेर दरवाज़ा है क्‍योंकि सिंहद्वार पर बने ये शेर हिंदुस्तानी सपूतों की दास्तान से जुड़े हैं जिन्होंने गदर में अपनी बहादुरी के कमाल दिखाए. 26 सितम्बर 1857 को मद्रास रेजीमेंट का जनरल नील जब मोती महल से रेसीड़ेंसी की तरफ जा रहा था, एक ‌हिंदुस्तानी ने उस पर बंदूक से वार कर दिया. जनरल नील उसी जगह गिर गया. मरने के बाद उसे बेली गारद के अहाते में दफना दिया गया था.

     लखनऊ के आलमबाग एरिया में है चंदर नगर गेट. इसे फांसी दरवाज़ा भी कहते हैं. क्योंकि यहाँ आज़ादी के मतवालों को फांसी दी जाती थी. कभी यहाँ चारों ओर बाग़ थे भंवरे थे और खुशबू थी. इस दरवाज़े को 1847-56 में तब बनवाया गया जब नवाब वाजिद अली शाह अपनी रानी आलम आरा (आज़म बहु) के लिए यहाँ एक महल बनवा रहे थे. इस महल के आर्किटेक्ट छोटे खान थे. लेकिन बाद में यह कोठी आजादी की लड़ाइयों में उजड़ गई. चंदर नगर गेट का अपना एक गौरवशाली अतीत है. यह आजादी की लड़ाई का एक अहम हिस्सा भी रहा है. जब विद्रोहियों ने रेजीडेंसी को सीज कर दिया तब अंग्रेज आलमबाग के रास्ते शहर में प्रवेश कर रहे थे. यहां मौलवी अहमद उल्लाह शाह और अंग्रेजों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. बताते हैं सर हेनरी हैवलॉक यहीं बीमार हुए थे, जिनकी मौत बाद में दिलकुशा में हुई थी. मौत के बाद उन्हें दिलकुशा के करीब स्थित कब्रिस्तान में दफन किया गया था. प्रथम स्वाधीनता संग्राम के अंतिम पड़ाव में अंग्रेजों ने इसी फाटक को किले के रूप में प्रयोग किया और कई क्रांतिकारियों को फांसी दी गई.

     छली दरवाज़ा अब इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय में स्थित है. एक ज़माने में यह बादशाह बाग़ का एंट्री गेट था. इसकी सीध में पड़ती है लाल बारादरी. जहाँ नवाब रुकते थे और फिर गोमती की ओर चले जाते थे. गोमती पार कर वे छतर मंज़िल में जाते थे या आते थे. अपने महल में घूमने के बाद वे  लौटते समय अमरूदों के बागों की ओर अलीगंज निकल जाते थे. दरअसल यह बादशाह बाग़ का दरवाज़ा था. बादशाह बाग़ जिसे बाद में महाराजा कपूरथला ने अंग्रेजों से खरीद लिया था. आज इसी बादशाह बाग़ में पिछले सौ सालों से लखनऊ विश्वविद्यालय है.  

जब भी आना लखनऊ तो खटका देना मुझे, 
जर्जर ही सही लेकिन दरवाज़ा हूँ मैं,
#rohittherainbow
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Lucknow in the first war of independence 1857 (1857 की ग़दर में लखनऊ)

अक्सर लोग इस वहम में रहते हैं कि लखनऊ महज़ रंगीनियत का नाम है. यहाँ सिर्फ शराब, शबाब, नवाब और कबाब के ही चर्चें हैं जबकि ऐसा नहीं है. लखनऊ ने वक़्त आने पर बड़े से बड़ा बलिदान भी दिया है. बात 1857 के दौर की है जब भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी के ज़ुल्मों से समूची मानवता त्राहि त्राहि कर रही थी. ऐसे में जब मेरठ में भारतीय सैनिकों को गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस दिए गये तो उनमे रोष फ़ैल गया. वे विद्रोह पर आमादा हो गए.  हालांकि दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में अंग्रेजों से भारत की आज़ादी के लिए योजना तैयार कर ली गयी थी. अवध में जिसका नेतृत्व नवाब वाजिद अली शाह की बीवी 'बेगम हज़रत महल' के हाथ में था. आखिरकार 10 मई 1857 को मेरठ से विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी. अवध की बेगम हज़रत महल एक मंझी हुई नेता के अलावा वीर योद्धा भी थीं. उन्होंने लखनऊ में विद्रोह की कमान सम्हाल ली. इस वक़्त वे अकेली थीं क्योंकि बादशाह वाजिद अली शाह को अँगरेज़ गिरफ्तार कर कलकत्ता के मटिया बुर्ज में कैद कर चुके थे. लखनऊ इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण था कि कंपनी के सामने अँगरेज़ अधिकारीयों ने अफगानिस्तान युद्ध से भी बड़ी संख्या में सैनिकों की मांग अवध में लड़ाई के लिए रखी थी.

आज चिनहट लखनऊ का एक दूरस्थ इलाका है लेकिन 30 जून 1857 को लखनऊ में चिनहट की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. चिनहट ने इस दिन इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करवा लिया था. यहाँ विद्रोहियों ने लगभग 200 अँगरेज़ सैनिकों को मार गिराया और 5 तोपें उनके कब्ज़े में आयीं. चिनहट में बर्तानिया सैनिकों को धुल चटाने के बाद उत्साहित विद्रोही केसरबाग स्थित रेसीडेंसी आ गए. इस रेजीडेंसी की दीवारें 1857 के विद्रोह को कभी न भूल पाएंगी. इसी बेली गार्ड या बेली गारद में विद्रोहियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. उन्होंने लगभग 600 अंग्रेजों को यहाँ बंधक बनाकर रखा और अंग्रेज बच न पायें इसलिए बाहर  से गोलियां और गोले बरसाते रहे. रेसीडेंसी आज भी लखनऊ में 1857 की ग़दर का के उन गवाहों में से एक है जो जिंदा हैं. ये याद दिलाता है कि किस तरह बागियों ने भारत की आज़ादी की नींव रखी.

16 नवम्बर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई बड़ी महत्वपूर्ण रही. यहाँ वीरांगना ऊदा देवी बड़े साहस और दिलेरी से लड़ी. वे नवाब की सेना के महिला दस्ते में थीं. उन्होंने मरदाना वेश बनाकर और यहीं एक पेड़ पर चढ़कर 32 अँगरेज़ सिपाहियों को मार गिराया. अँगरेज़ उनसे इतना भयभीत हो गए कि महल में घुसते समय उन्होंने उनका पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. दिलकुशा कोठी कभी नवाबों और अंग्रेजों की आरामगाह थी लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद इसको क्रांतिकारियों ने अपना ठिकाना बना लिया था. लेकिन जैसे जैसे विद्रोह दबता गया वैसे अँगरेज़ हावी होते गए और एक दिन उन्होंने इस कोठी पर भारी गोला बारूद बरसा कर विद्रोहियों को मार कर इस पर कब्ज़ा कर लिया.

1857 की ग़दर में बेगम हज़रत महल ने आज़ादी की लड़ाई अवध के एक किले मूसा बाग़ में लड़ी थी. यहाँ आलमबाग को जीतकर अंग्रेजों ने धावा बोल दिया था. लेकिन यहं अँगरेज़ कैप्टेन वेल्स को मार दिया गया था जिसकी मजार यही पर है. और अब लोग उस पर सिगरेट का चढ़ावा चढ़ाकर मन्नतें मांगते हैं. बेगम हज़रत महल लड़ी पुरजोर लड़ी लेकिन आखिर में पस्त हो गयीं और अपने बचे खुचे सिपाहियों के साथ नेपाल में शरण ली. अवध पर दुबारा कब्ज़ा करने के लिए कंपनी को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ा था और यही एक आखिरी रियासत थी जिसे उन्होंने सबसे आखिर में दुबारा हासिल किया था. अवध में विद्रोह का नेतृत्व करने वाली बेगम हज़रत महल की कब्र पडोसी मुल्क नेपाल में ही है. लेकिन वहां उनकी शहादत पर मेला नहीं लगता. जबकि मैंने सुना था कि
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा,

आपकी प्रतिक्रियायों का इंतजार रहेगा.

#rohittherainbow