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Thursday, January 10, 2019

मेरी चीन यात्रा - 1 इंटरनेशनल फ्लाईट


साल 2009 की जुलाई में मुझे चीन जाने का निमंत्रण मिला, मौका था अंतर्राष्ट्रीय यूनियन फॉर अन्थ्रोपोलोजिकल एंड एथनोलोजिकल साइंसेज की 16वीं कांग्रेस का जो कि चीन के कुनमिंग शहर में हो रही थी और आयोजक थी युन्नान युनिवर्सिटी. दरअसल कुनमिंग युन्नान प्रान्त की राजधानी है. मुझे वहां इतनी बड़ी कांग्रेस के एक कांफेरेंस पैनल में बतौर को-चेयरपर्सन सहभागिता करने का अवसर मिला था. मैं शायद सबसे कम उम्र का पनेलिस्ट रहा होऊंगा. एक गर्व की बात यह थी कि हमारे पैनल में 42 शोध पत्र पढ़े जाने थे. जो कि संख्या के लिहाज़ से सबसे ज्यादा थे. मैं दो मामलों में ज्यादा उत्साहित था, पहला अपनी विदेश यात्रा को लेकर और दूसरा विश्व की सबसे बड़ी कांफेरेंस का हिस्सा बनकर वो भी बतौर पेनेलिस्ट.
चूँकि मेरी यह सबसे पहली विदेश यात्रा थी तो मन में एक कौतुहल मिश्रित भय था. आगे कोई दिक्कत न हो इसलिए हमने टिकट लखनऊ से ही करवा लिया था और वीज़ा भी. हमारा टिकट कोलकाता से बैंकाक फिर कुनमिंग के लिए हुआ था. हम 4 लोग कोलकाता के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बैंकाक के लिए थाई एयरवेज से रवाना हुए. कोलकाता एअरपोर्ट भी वहां की संस्कृति के अनुरूप ही बनाया और सजाया गया था. अब तो उसमे भी बहुत परिवर्तन हो चुके हैं. वर्तमान कोल्कता एअरपोर्ट बहुत विशालकाय है. खैर मन में चीन देखने की हसरत पाले मैं उड़ चला समुन्दर पार. हवाई जहाज काफी बड़ा था इतना बड़ा हवाई जहाज देखकर मैं अचम्भे में था. चूँकि पहली विदेश यात्रा थी तो पहली बार ही इंटरनेशनल फ्लाइट भी अन्दर से देखने का मौका मिला. सीटें 2:4:2 के अनुपात में थी, सौभाग्य से मेरी विंडो सीट थी जो कि मेरी प्रिय सीट है. मुझे हवाई जहाज को ज़मीन छोड़ते हुए देखना अच्छा लगता है. नीचे खेतों को देखकर लगता है जैसे किसी से काली सफ़ेद के बजाय हरी शतरंज बिछा रखी है. सीट पर ही बैंगनी रंग के पाउच में इअरप्लग्स रखे हुए थे जो कि सीट से जुड़े हुए थे. प्लेन में थाई एयरवेज़ का कॉपीराइटेड संगीत बज रहा था. बीच वाली सीटो के सामने बहुत बड़ा टेलीविज़न लगा हुआ था. जिस पर एक हिंदी फिल्म चल रही थी. मन प्रसन्न सामने अनिल कपूर की फिलिम और देसी लोग. कुछ देर बाद उड़ने की सारी औपचारिकतायें पूरी होने के बाद प्लेन ने जानी पहचानी घरघराहट के साथ उड़ान भरी. एक चीज़ की आराम थी कि इंटरनेशनल फ्लाईट में आप फोटो खींच सकते थे. उस समय घरेलु उड़ानों में फोटो खींचने पर मनाही थी. अब तो खैर सब जगह अलाउड है.
इधर प्लेन हवा में ऊंचे और ऊंचे जा रहा था उधर मेरे मन का रोमांच भी. थोड़ी देर बाद प्लेन में शराब परोसी गयी लेकिन मैं ठहरा पानीवादी इन्सान तो मैंने डाइट कोक पिया. शायद वाइन वालों के पेग पर कोई रोक नहीं थी क्योंकि पीछे की सीट के सज्जन तीन पी चुके थे. पीने-पिलाने के दौर के बाद खाना भी आ ही गया, मेरा तो मन खुश हो गया जैसे कण्ट्रोल में न रहा हो. ठेठ देसी थाली. राजमा, चावल, रोटी, अचार, रायता. उफ्फ, मन तो हवा में जैसे और ऊंचे पहुँच गया हो. इतनी ऊँचाई पर इन्डियन मसालेदार खाना वो भी गरमा गरम, वाह भाई वाह. लखनौव्वा क्या चाहे दो पूड़ी और सब्ज़ी लेकिन यहाँ तो पूरी थाली थी. थोड़ी ही देर में थाली सफाचट. मैंने खाने के लिए थाई एयरवेज़ को बहुत धन्यवाद कहा और थोड़ी देर के लिये सो गया.
कलकत्ते से बैंकाक का सफ़र बहुत लम्बा नहीं है थोड़ी ही देर बाद उद्घोषणा होने लगी कि हवाई जहाज बैंकाक के सुवर्णभूम हवाई अड्डे पर उतरने वाला है. मैं भी तैयार था पहली बार विदेशी सरज़मी छूने को. एअरपोर्ट पर उतरते ही आँखें जैसे चुन्धियाँ गयीं. अरे बाप रे इत्ता बड़ा एअरपोर्ट. उफ्फ्फ. मैं इसकी विशालता देखकर चकित था. अभी तक जिस एअरपोर्ट के बारे में पढ़ा था वह असल में इतना बड़ा होगा मैंने कल्पना भी नहीं की थी. वहां जटायु, राम, रावण की मूर्तियाँ, हिन्दू और बौद्ध धर्म से सबन्धित अन्य वस्तुएं करीने से बनाकर सजाकर रखी गयी थी. चारों और स्केलेटर्स का जाल बिछा हुआ था. हवाई अड्डे के अन्दर गोल्फ कार्ट्स भी चल रही थीं. मुस्तैद सिपाही अपनी पैनी निगाह हर आने जाने वाले यात्री पर रखे हुए थे. क्योंकि इस हवाई अड्डे पर ड्रग पैडलर्स अक्सर पकडे जाते हैं. भारत से चलते समय मुझे उनसे सावधान रहने की ताकीद दी गयी थी.
हमने थ्रू चेक-इन कर रखा था इसलिए हैण्डबैग के अलावा किसी और चीज़ की चिंता नहीं थी. हमारा सामान अपने आप दूसरी कनेक्टिंग फ्लाईट में लोड कर दिया जायेगा. आप भी जब कनेक्टिंग फ्लाईट से जाएँ तो लगेज थ्रू चेक-इन ही कीजिये इससे आप बाकी के झंझटों से बच जायेंगे. कुनमिंग की फ्लाईट में अभी 4-5 घंटे थे तो इतना समय तो हमें ट्रांजिट में ही गुज़ारना था. तो शुरू हुआ सुवर्णभूम हवाई अड्डा घूमने का सिलसिला. एक छोर से दूसरे नज़र नहीं आ रहा था. हाँ हर मिनट हवाई जहाजों की गडगडाहट सुनाइ दे रही थी और सुनाई दे रहा था हजारों लोगों का शोर. हवाई अड्डे पर शराब की कई दुकाने थीं मैंने इतने नामचीन ब्रांड्स पहली बार एकसाथ देखे थे. एक फोटो तुरंत खिंचवा भी ली यादगार के तौर पर. 
एअरपोर्ट पर घूमते फिरते समय बीतने लगा और तभी हमारी फ्लाईट की उद्घोषणा भी हो ही गयी. उस समय सुबह भी करीब ही थी. सुबह का साढ़े तीन शायद बज रहा था. इधर उधर चढ़ते हुए हम लोग भी अपने प्रस्थान वाले गेट पर सिक्यूरिटी चेकिंग के लिए पहुँच गए. मैंने भी जूते, बेल्ट और वेस्ट पाउच खोलकर ट्रे में रखा और लाइन में लग गया मेरी जामा तलाशी हुई तो पूछा गया कि-इज़ इट योर वेस्ट पाउच? मैंने कहा यस इट्स माइन. वे बोले- प्लीज कम दिस साइड एंड ओपन इट. समथिंग ससपीशियस इन दिस. मैं सन्न रह गया.. कि यहाँ क्या हो गया अब क्या होगा. यही सब सोचते सोचते मैंने अपना वेस्ट पाउच उनके सामने खोल दिया. उसमे से लिक्विड बाम की एक छोटी सी शीशी मिली. वे बोले- व्हाट इज़ दिस. मैंने कहाँ- दिस इस लिक्विड बाम, ऐज़ आई एम माईग्रेन पेशेंट. इट रीलीजेज़ माई पेन. इतना सुनकर उन्होंने उसे सूंघा वूंघा और फिर संतुष्ट होकर मुझे जाने दिया. मैंने चैन की सांस ली. थोड़ी देर बाद हम लोग अपनी दूसरी फ्लाईट में सवार थे.
शेष अगले अंक में
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