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Saturday, July 26, 2008

मैं और ईश्वर..............















सौ सौ बार चिताओं ने मरघट पर पे मेरी सेज बिछाई,

सौ सौ बार लहू ने रोकर मेरा तन श्रृंगार किया,

सौ सौ बार धूल ने मेरे गीतों की आवाज़ चुराई,

पर एक बार भी मेरी जग में मौत नहीं होने पाई,

मैं स्वयं सिद्ध हूँ स्वयं बनाये रस्तों पे चलने वाला,

मैं अटल सत्य हूँ दिग दिगंत का रखवाला,

कहाँ खोजता है तू मंदिर और मस्जिद में मुझको,

मैं तो हूँ अपने मरघट में रास रचाने वाला,