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Friday, September 13, 2013

ज़रा अपनी सोच का एंगेल बदलिए


‘यार वो जो है न तुम्हारे घर के बगल में जो रहती है उसे मैंने कल बार में देखा था, अबे शॉट्स पे शॉट्स लगा रही थी, मैं तो उसे बड़ी सीधी समझता था लेकिन वो तो सबके कान काटे हुए है, या वो जो लड़की क्लास में बालों में तेल लगाकर आती है कल तो उसे मैंने बड़े मॉडर्न आउट फिट्स में देखा, मुझे तो बिलीव ही नहीं हुआ कि जो एकदम बहनजी टाइप बनकर आती है वो ऐसी भी हो सकती है|’ ऐसे किस्से लड़कों के बीच में बड़े आम होते हैं जहाँ पर लड़कियों के खुलकर जीने को बड़े ही अचरज भरे अंदाज़ में देखा और सुना जाता है और इस बातचीत में लड़कियों को ना जाने किन-किन उपाधियों से विभूषित किया जाता है| लेकिन गुरु समझ में नहीं आता कि जब लड़के खुले आम बीयर, शराब, सिगरेट पीकर या लो-वेस्ट जींस पहनकर, जिसमे बमुश्किल वे घुस पाते हैं, घूम सकते हैं तो लड़कियों के ऐसा करने पर आश्चर्य किस बात का| हम बाइक्स पर फर्राटा भरे तो रंगबाज़ी और वो भरें तो बदनामी, ये अच्छा है|
मैं यहाँ पर महिला सशक्तिकरण या महिलाओं पर किसी मुद्दे को हवा नहीं दे रहा हूँ बल्कि आपसे आपकी सोच बदलने की ज़हमत उठाने को कह रहा हूँ, वो भी अगर आपको ठीक लगे तो वर्ना क्या पता कब किसका धर्म खतरे में आ जाए और बलि पर हम चढ़ जाएँ या आधी आबादी पर तेज़ाबी हमलों में बाढ़ आ जाए| अमा हुज़ूर सोचिये अगर यही टोका-टाकी लड़कों के साथ की जाए कि फलां जगह मत जाओ, ये मत करो वो मत करो, ये कपड़े पहनो वो मत पहनो, एटसेट्रा एटसेट्रा| क्रांति होते देर नहीं लगेगी क्योंकि आज़ादी जब-जब खतरे में पड़ी है तब-तब क्रांति ही हुई है, अमा कहिये लड़ जाए माँ-बाप से, सड़कों पर इजिप्ट बना दें, उन्हें क्या उन्हें तो लड़कियों का नेता बनना भी ठीक नहीं लगता है, नेता बनना तो लड़कों का खानदानी काम है क्योंकि पुरुषों की राय में तो राजनीति में ऐसी-वैसी लड़कियाँ ही जाती हैं, लड़के तो साक्षात राजा हरिशचंद्र का अवतार हैं या मॉडलिंग और फिल्मों में काम करने वाली तो हर समय आपके साथ कहीं भी जाने को रेडी रहती हैं उन्हें तो बस गाड़ी, पैसा और घूमना ही चाहिए| सड़क पर कहीं थोड़ा मॉडर्न लड़की दिख जाए तो कहिये कि आँखों-आँखों में ही आई.पी.सी. का सेक्शन 376 कर दें, उस पर मर्दानगी की  हरकतें और फब्तियां और पलट-पलट कर तो ऐसे देखेंगे जैसे घर तक छोड़ आयेंगे, लड़की के माता-पिता को बता भी आएंगे कि इसे घर तक छोड़ गए हैं कल ये कितने बजे बाहर जायेगी?
एम्बिशस लड़की मेल डोमिनेटेड सोसाइटी को सहन नहीं होती है| पुरुष की राय में तो लड़कियाँ घर के अंदर ही अच्छी लगती हैं उन्हें उनका स्मार्ट होना सुहाता नहीं है| पर यहाँ भी दुहरा चरित्र दिख जाता है उसे घर के लिए सती तो बाहर के लिए सनी चाहिए| जिसके साथ वो सोसाइटी मूव कर सके और हर वो काम कर सके जिसमे उसकी मर्दानगी को सैटिस्फैक्शन मिले, ऐसी दो-चार और हो तो ज़्यादा अच्छा, लेकिन अगर कहीं बीवी किसी पराये पुरुष के साथ दिख जाए तो कहिये क़त्ल-ओ-गारद मच जाए| कैरेक्टरलेस से लेकर न जाने कौन-कौन से अलंकारों से पत्नी को नवाज़ा जाए| अमा जिस तरह से आप सोच रहे हैं कि आपकी बीवी आपके साथ नहीं जंच रही है तो वो मोह्तरिमा भी तो ऐसा सोच सकती हैं, तो उनके आज़ादी के साथ जीने में आप नाहक ही खलल डाल रहे हैं| अपनी सोच का एंगल कभी इस ओर मोड़ा क्या आपने, शायद नहीं|
लड़कियों को भी आज़ादी से सोचने और जीने का हक़ है| हम और आप उसे आज भी उसे सात पर्दों में रखना चाहते हैं तो फिर आप बताये आपमें और और उनमे क्या फर्क है जिन्होंने मलाला युसुफजई को गोलियों से भूनने में कोई कसर नहीं रखी| फ्रीडम सबके लिए है, एक की आज़ादी दूसरे की आज़ादी का अतिक्रमण नहीं कर सकती है| सब को हक़ है उसके मुख्तलिफ लाइफ स्टाइल से जीने का तो दूसरा उसमे हर्डल क्यों लगा रहा है| लड़कियों के लिए क्या अच्छा है क्या बुरा है इसका फैसला कोई नहीं कर सकता है उन्हें ही करने दें| आपके पास ऐसी कोई वजह नहीं है जिससे आप रोक-टोक के बैरीयर लगा सकें, अरे पानी और हवा को कोई रोक पाया है| समय के साथ चलिए, न उससे आगे और उसके पीछे, और हाँ जनाब आपकी पोल्युटेड सोच ही तेज़ाबी हमलों में बाढ़ ला रही है, इसे रोकें|
(Published in Inext on 24 January 2014)

Friday, January 4, 2013

सुख दुःख के साथी चाय और समोसा


घर के बाहर वाली गली के नुक्कड़, कॉलेज कैम्पस, रेलवे स्टेशन पर रुकते और फ्लाईट में उड़ते हुए बिना चाय-समोसे के ज़िंदगी सोची ही नहीं जा सकता है. जब भी कभी हम दोस्त इकठ्ठा हुए तो बात हुई कि चलो चाय पी जाती है और अगर समोसे भी हो जाएँ, वो भी चटपटी चटनी के साथ तो सोने पे सुहागा. चाय और समोसे के बिना कॉलेज लाइफ हो या हमारी ऑफिशियल लाइफ सोची ही नहीं जा सकती है. हर शहर में कुछ दुकानें ऐसी होती हैं जिनके यहाँ की चाय और समोसे बहुत ही फेमस होते हैं और हम सबके सब वहाँ जाकर चाय पीने के आदी हो जाते हैं. लेकिन कभी हमने चाय और समोसे की इकॉनोमिक्स के बारे में सोचा नहीं. इतने सारे लोग डेली जाते हैं इन दुकानों पर, मज़े से चटखारे लेके चले आते हैं लेकिन कभी ज़िक्र तक नहीं किया की ये ‘इंडियन रेडिमेड रिफ्रेशमेंट’ हम लोगों का पेट भरने के साथ-साथ कितना बड़ा टाइम पास है. इन दोनों को तो लाइफ टाइम अचीवमेंट या एवरग्रीन अवार्ड भी मिलना चाहिए. न जाने कितने लोगों का पेट भर रहे हैं ये दोनों एक साथ वो भी सिर्फ दस रूपए में, खाने वाले के साथ-साथ बनाने वाले का भी.
समोसे ऐसा नहीं कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही बनते हैं बल्कि ये विदेश में भी खूब बनाये जाते हैं जैसे- बीफ समोसा, पास्ता समोसा और नूडल्स समोसा. लेकिन हमारी इंडिया में मसालेदार आलू भरकर बनाये गए समोसे बहुत पसंद किये जाते हैं. समोसे के साइज़ के साथ-साथ इसकी और चाय की कीमत हर दुकान में अलग-अलग ही तय होती है. इन्हें भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है, जैसे- तिकोना या सिंघाड़ा. लेकिन चाय तो चाय है, इसे सब कहीं चाय के नाम से ही जाना जाता है. लेकिन ये दोनों हमदम सब कहीं एक साथ ही मिलते हैं, और सभी लोगों का इनके साथ बर्ताव एक जैसा ही होता है मतलब सुख-दुःख के साथी. ये दोनों आपके साथ हों तो टाइम कब निकल जाता है पता भी नहीं चलता है.
अब तो चिल्ड विंटर्स हैं तो इन दोनों की ज़रूरत भी ज़्यादा बढ़ गई है. फ़र्ज़ कीजिये कि कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा हो और आपके हाथों की हथेलियाँ सुन्न पड़ने लगी हों तभी कोई ‘छोटू’ शीशे के गिलास में गरमागर्म चाय दे जाये और आप उसको कसकर अपनी हथेलियों में दबा ले और सामने मसालेदार आलू से भरा गर्म समोसा हो, तो कहने ही क्या. मतलब वही सोने पे सुहागा वाली कहावत चरितार्थ हो गई. दूसरी ओर ऐसा भी हो सकता है कि आप अपना एक्ज़ाम देकर आये हों और तीन घंटे बैठे-बैठे आपकी पीठ अकड़ गई है, आप थक कर चूर हो गए है, तो अपने कॉलेज के बाहर वाली चाय की दूकान देखकर आँखों में अजीब सी चमक आ जाती है, जैसे सबकुछ मिल गया हो क्योंकि एक्ज़ाम देने के बाद बड़े ही ज़ोर की भूख भी लगती है, वहाँ पर चाय और समोसे का लुत्फ़ लेकर फिर आप घर जाते हैं और आराम से आराम करते हैं और मन ही मन थैंक्स बोलते हैं उस चाय वाले को. गौर कीजिये कि चाय की नाजायज़ दुकान लगाने वाला हमें ठंडक और थकान में कितना सुकून देता है.
दरअसल चाय और समोसा हमारी डेली लाइफ का वो हिस्सा है जिसे हम खुद से अलग करके सोच ही नहीं सकते हैं. हम शहर दर शहर बदलते हैं, अनजाने लोग, अनजाने रास्ते और अनजानी इमारतें लेकिन अगर हमें कहीं कोई जानी पहचानी चीज़ मिलती है तो वो यही दोनों हैं. वही चाय के गिलासों से चम्मच के टकराने की जलतरंग सी जानी पहचानी आवाज़ और वही मसालेदार आलू से भरे हुए गर्म समोसे. जनाब तबीयत खुश हो जाती है और शरीर रोमांचित, इन दोनों को अपने सामने देखकर और हम बोलते हैं- ऐ छोटू एक चाय लाना मलाई मार के और साथ में समोसा भी चटनी के साथ.
आज भारतीय बाज़ारों में न जाने कितने मल्टीनैशनल फ़ूड ब्रांड्स ने अपना अधिकार कर लिया है. शायद हिपहॉप और कंटेम्पररी वाली जेनेरेशन अब चाय और समोसे की नहीं बल्कि पिज्ज़ा, बर्गर और फ्राइड चिकन की दीवानी है. लेकिन ये सब मिलकर भी हमें केवल दस रूपए में चाय और समोसे का वो मज़ा नहीं दे सकते हैं जिसमें दोस्तों की दोस्ती और चटपटी बातें मुफ्त में हों क्योंकि दोस्ती का असली मज़ा तो फुटपाथ वाली चाय की दुकान पर ही है, ए.सी. रेस्टोरेंट की तहज़ीब में वो बात कहाँ.
(20 दिसंबर 2013 के आई-नेक्स्ट में प्रकाशित)