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Tuesday, October 10, 2017

बोल दुग्गा माँ की जय (कोलकाता भ्रमण 2017 भाग 1)

कोलकाता का एरिएल वियु
एक बार फिर कोलकाता जाना हुआ, नहीं नहीं छुट्टियाँ बिताने नहीं ऐसे ही मन हुआ घूम आया जाये सो प्लान बना लिया गया, अक्सर ऐसी जगहों पर ही राहुल याद आते हैं अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा. कोलकाता पहली बार मैं 2000 में गया था और तब से कई बार घूम चुका हूँ, सबसे बड़ी बहन की ससुराल वहीँ है सो आनाजाना लगा रहता हैं. हर बार तो अकेले गया पर इस बार परिवार के साथ हूँ. लखनऊ से कोलकाता जाने के लिए ट्रेन भी हैं और प्लेन भी. अंतर सिर्फ समय का है, एक्सप्रेस ट्रेन से जहाँ 24 घंटे लगते हैं वहीं डायरेक्ट फ्लाईट से सिर्फ सवा घंटा. कोलकाता का दूसरा नाम सिटी ऑफ़ जॉय गलत नहीं है, प्रकृति और कोलकातावासी सब यहां आनंदित रहते हैं. हवाई जहाज से नीचे देखने पर जब हर घर में नारियल और सुपाड़ी के पेड़ दिखने लगें तो समझ लीजिये कि आप कोलकाता के ऊपर उड़ रहे हैं. जैसे ही नीचे हरियाली दिखी मन में थोडा झुरझुरी हुई, लेकिन ये जहाज के लैंडिंग प्रेपरेशन की थी जिसमे कानों में कम आवाज़ सुनाई देने लगती है और पेट जैसे लगता है गले को आ रहा है. थोड़ी ही देर में हम लैंड कर गए. पिछली बार की अपेक्षा इस बार नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंटरनेशनल एअरपोर्ट और बड़ा हो गया है एकदम दिल्ली के टर्मिनल-3 की तरह. हम उतरे कन्वेयर बेल्ट से सामान लिया, माता जी के लिए व्हील चेयर का इंतजाम हो ही गया था, ये सबसे बढ़िया बात है हवाई सफ़र की कि वृद्धजन और दिव्यांगों को दिक्कत नहीं होती. हमें दमदम से कोलकाता के दूरे सिरे गडिया जाना था करीब 25 किलोमीटर दूर. बहनजी गाड़ी लेकर आ चुकी थीं और शुरू हो गया सिटी ऑफ़ जॉय में एन्जॉय. हम इस बार न्यू कोलकाता होते हुए गड़िया जा रहे थे. तीन साल पहले जब आया था तब यहाँ ये इमारतें बन रही थी पर अब बन चुकी थी और उनमे बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तर चल रहे थे. साफ़ सुथरा बारिश में नहाया हुआ न्यू कोलकाता.
दुर्गा पूजा पंडाल में सपरिवार विराजमान माँ दुर्गा
दशमी 30 को ही बीती थी लेकिन पूरे कोलकाता में धुनुची के लोबान की महक फिजाओं में थी. लोगों के चेहरे पर पूजा के उल्लास और थकान के मिश्रित भाव थे. जगह-जगह पूजा पंडाल सजे हुए थे जो हमारे लखनऊ में बनने वाले पंडालों से एकदम अलग थे जिनपर बंगाल की कलात्मकता स्पष्ट छाप थी. लखनऊ के पंडालों में जहाँ व्यावसायिकता और दिल्ली का माता का जगराता झाँकता है वहीँ कोलकाता में आध्यात्म और कलाकारों का हुनर. कोलकाता में बड़ी-बड़ी झीलों और तालाबों से पानी की आपूर्ति की जाती है जिनका हाल ही में सौन्दर्यीकरण किया गया है. किनारों पर नारियल, सुपाड़ी और सायिकास के पेड़ लगायें गए हैं. ऊपर नीला आसमान नीचे हरे भरा कोलकाता, दोनों मिलकर सुन्दरता का अनोखा मिश्रण बनाते हैं.
एक सुन्दर तालाब 
शनिवार होने के बावजूद भी सड़कों पर खासी भीड़ थी. ट्रैफिक सार्जेंट बहुत मुस्तैदी से यातायात नियंत्रित कर रहे थे. लोगबाग भी उनका साथ देते हुए सिग्नल के इशारों पर ही चल रहे थे, अपने लखनऊ की तरह नहीं कि रेड सिग्नल पर भी भौकाल टाईट करते हुए ज़ूम से गाड़ी निकाल ली. बारिश ने शायद हमारे आने की खबर पाकर सड़कों को धो दिया था. साल्ट लेक इलाके में एक नया "ईको पार्क" बनाया गया है जिसमे विश्व के आश्चर्य बनाये गए हैं जैसे; ताज महल, पीसा की मीनार वगैरह वगैरह. धीरे धीरे सभी जानी पहचानी जगहें साइंस सिटी, रूबी हॉस्पिटल, पियरलेस हस्पताल आँखों के सामने से निकल रही थी. हालाँकि इतवार होने की वजह से सडकों पर आम दिनों वाली भीड़ नहीं थी फिर भी करीब डेढ़ घंटा लग गया और हम लोग सकुशल बहनजी के घर आ गए.
(शेष अगले अंक में जारी है)