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Friday, January 4, 2013

सुख दुःख के साथी चाय और समोसा


घर के बाहर वाली गली के नुक्कड़, कॉलेज कैम्पस, रेलवे स्टेशन पर रुकते और फ्लाईट में उड़ते हुए बिना चाय-समोसे के ज़िंदगी सोची ही नहीं जा सकता है. जब भी कभी हम दोस्त इकठ्ठा हुए तो बात हुई कि चलो चाय पी जाती है और अगर समोसे भी हो जाएँ, वो भी चटपटी चटनी के साथ तो सोने पे सुहागा. चाय और समोसे के बिना कॉलेज लाइफ हो या हमारी ऑफिशियल लाइफ सोची ही नहीं जा सकती है. हर शहर में कुछ दुकानें ऐसी होती हैं जिनके यहाँ की चाय और समोसे बहुत ही फेमस होते हैं और हम सबके सब वहाँ जाकर चाय पीने के आदी हो जाते हैं. लेकिन कभी हमने चाय और समोसे की इकॉनोमिक्स के बारे में सोचा नहीं. इतने सारे लोग डेली जाते हैं इन दुकानों पर, मज़े से चटखारे लेके चले आते हैं लेकिन कभी ज़िक्र तक नहीं किया की ये ‘इंडियन रेडिमेड रिफ्रेशमेंट’ हम लोगों का पेट भरने के साथ-साथ कितना बड़ा टाइम पास है. इन दोनों को तो लाइफ टाइम अचीवमेंट या एवरग्रीन अवार्ड भी मिलना चाहिए. न जाने कितने लोगों का पेट भर रहे हैं ये दोनों एक साथ वो भी सिर्फ दस रूपए में, खाने वाले के साथ-साथ बनाने वाले का भी.
समोसे ऐसा नहीं कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही बनते हैं बल्कि ये विदेश में भी खूब बनाये जाते हैं जैसे- बीफ समोसा, पास्ता समोसा और नूडल्स समोसा. लेकिन हमारी इंडिया में मसालेदार आलू भरकर बनाये गए समोसे बहुत पसंद किये जाते हैं. समोसे के साइज़ के साथ-साथ इसकी और चाय की कीमत हर दुकान में अलग-अलग ही तय होती है. इन्हें भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है, जैसे- तिकोना या सिंघाड़ा. लेकिन चाय तो चाय है, इसे सब कहीं चाय के नाम से ही जाना जाता है. लेकिन ये दोनों हमदम सब कहीं एक साथ ही मिलते हैं, और सभी लोगों का इनके साथ बर्ताव एक जैसा ही होता है मतलब सुख-दुःख के साथी. ये दोनों आपके साथ हों तो टाइम कब निकल जाता है पता भी नहीं चलता है.
अब तो चिल्ड विंटर्स हैं तो इन दोनों की ज़रूरत भी ज़्यादा बढ़ गई है. फ़र्ज़ कीजिये कि कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा हो और आपके हाथों की हथेलियाँ सुन्न पड़ने लगी हों तभी कोई ‘छोटू’ शीशे के गिलास में गरमागर्म चाय दे जाये और आप उसको कसकर अपनी हथेलियों में दबा ले और सामने मसालेदार आलू से भरा गर्म समोसा हो, तो कहने ही क्या. मतलब वही सोने पे सुहागा वाली कहावत चरितार्थ हो गई. दूसरी ओर ऐसा भी हो सकता है कि आप अपना एक्ज़ाम देकर आये हों और तीन घंटे बैठे-बैठे आपकी पीठ अकड़ गई है, आप थक कर चूर हो गए है, तो अपने कॉलेज के बाहर वाली चाय की दूकान देखकर आँखों में अजीब सी चमक आ जाती है, जैसे सबकुछ मिल गया हो क्योंकि एक्ज़ाम देने के बाद बड़े ही ज़ोर की भूख भी लगती है, वहाँ पर चाय और समोसे का लुत्फ़ लेकर फिर आप घर जाते हैं और आराम से आराम करते हैं और मन ही मन थैंक्स बोलते हैं उस चाय वाले को. गौर कीजिये कि चाय की नाजायज़ दुकान लगाने वाला हमें ठंडक और थकान में कितना सुकून देता है.
दरअसल चाय और समोसा हमारी डेली लाइफ का वो हिस्सा है जिसे हम खुद से अलग करके सोच ही नहीं सकते हैं. हम शहर दर शहर बदलते हैं, अनजाने लोग, अनजाने रास्ते और अनजानी इमारतें लेकिन अगर हमें कहीं कोई जानी पहचानी चीज़ मिलती है तो वो यही दोनों हैं. वही चाय के गिलासों से चम्मच के टकराने की जलतरंग सी जानी पहचानी आवाज़ और वही मसालेदार आलू से भरे हुए गर्म समोसे. जनाब तबीयत खुश हो जाती है और शरीर रोमांचित, इन दोनों को अपने सामने देखकर और हम बोलते हैं- ऐ छोटू एक चाय लाना मलाई मार के और साथ में समोसा भी चटनी के साथ.
आज भारतीय बाज़ारों में न जाने कितने मल्टीनैशनल फ़ूड ब्रांड्स ने अपना अधिकार कर लिया है. शायद हिपहॉप और कंटेम्पररी वाली जेनेरेशन अब चाय और समोसे की नहीं बल्कि पिज्ज़ा, बर्गर और फ्राइड चिकन की दीवानी है. लेकिन ये सब मिलकर भी हमें केवल दस रूपए में चाय और समोसे का वो मज़ा नहीं दे सकते हैं जिसमें दोस्तों की दोस्ती और चटपटी बातें मुफ्त में हों क्योंकि दोस्ती का असली मज़ा तो फुटपाथ वाली चाय की दुकान पर ही है, ए.सी. रेस्टोरेंट की तहज़ीब में वो बात कहाँ.
(20 दिसंबर 2013 के आई-नेक्स्ट में प्रकाशित)