कोलकाता मेरा आना कई बार हो चुका है लेकिन इस बार उद्देश्य दूसरा है। लगातार गिर रहे पुलों की वजह से सिटी ऑफ जॉय का नाम यहां के स्थानीय निवासियों ने सिटी ऑफ भोय (भय का शहर) रख दिया है और आजकल यहां सोशल मीडिया इससे भरा भी रहता है। खैर इन सबसे दूर ऐन विश्वकर्मा पूजा वाले दिन मेरा यहां पदार्पण हुआ। उद्देश्य मेडिकल टूरिज्म है लेकिन जाना यहाँ से आगे भी है। कोलकाता पहले से काफी व्यवस्थित नज़र आ रहा है. देखकर अच्चा लग रहा है. ऊंची ऊंची इमारतें, बिजली के खम्भों पर सांप की तरह लिपटी LED लाइट्स और न जाने क्या क्या. लेकिन जो कुछ भी है वो आँखों को भरमा रहा है.
दुर्गा, सरस्वती, शनि और विश्वकर्मा के भक्त बंगालियों में इनका समन्वय दिखता भी है। मेरा यहां आना भी विश्वकर्मा पूजा पर ही हुआ चारों तरफ छोटे छोटे रंग बिरंगे पंडाल सजे हुए हैं। सड़कों पर नाच गाकर लोग खुशियां मना रहे हैं। साल्ट लेक स्टेडियम में दो मशहूर क्लबों के बीच एक मैच भी था जिसे देखने को पूरा शहर जैसे गुत्थम गुत्था था। मूर्तिकार और प्रसिद्ध लेखकों से यह शहर बाहर पड़ा है। पिछले कई सालों से ममता बंदोपद्ध्यय इसका सौंदर्यीकरण करने में जुटी हैं। उन्होंने यहां फ्लोटिंग मार्किट भी बनवाया है। जो बड़ी मोहक जान पड़ती है। हालाँकि पहले लोग ऐसे ही सब्जियां वगैरह बेचते थे पर फ्लोटिंग मार्किट बनने के बाद विक्रेता अन्दर नाव में बैठकर सामान बेचते हैं. सक्सेस रेट क्या है पता नहीं लेकिन सौन्दर्यीकरण हुआ है. यह ऐन पाटुली चौराहे पर ही है जहाँ से एक रास्ता गडिया को जाता है. पंडाल बनने शुरू हो चुके हैं. सड़क के दोनों किनारों पर विज्ञापनों के लिए बांस भी बांधे जा चुके है. इंतजार है तो बीएस पूजा का.
नार्थ कोलकाता और साउथ कोलकाता में वही अंतर है तो चांदनी चौक और वसंत बिहार में है। कोलोनियल पीरियड की यादों से यह शहर पटा हुआ है। बर्तानिया शैली के घर और दुकाने आपको पुराने लंदन की याद दिला सकती हैं। मेट्रो का जाल धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल रहा है। जो सुदूर क्षेत्रों को आपस मे जोड़ रहा है। ट्रैफिक हद से ज़्यादा है लेकिन दिल्ली की तरह चोक नही करता। पुलों के बजाय ज़मीन के अंदर भी सड़कों की ज़रूरत महसूस होती दिखाई दे रही है। सुबह से ही वाहनों की चिल्लपों चालू हो जाती है. मजदूरों का कहा जाने वाला यह शहर लगता है अब अमीरों का हो रहा है.
गड़िया हाट घूमते हुए एक दुकान दिखाई दी जहां मंगोल देशों से आयात की हुई मोहक मूर्तियां और आर्टिफिशल फूल दिखाई दिए। भारत के बड़े शहरों में ये आमतौर पर दिख जाते हैं। भारतीय भगवान जो कि चीन या थाईलैंड के कारखानों में यहां के व्यापारियों के आर्डर पर बनते हैं। छोटे शहरों में जो डुप्लीकेट मूर्तियाँ मिलती हैं उनमें इतनी सफाई नहीँ दिखती। एक से एक खूबसूरत मूर्तियाँ, प्लास्टिक के पौधे. कम्बोडियन बुद्ध, चाइनीज़ बुद्ध, थाई बुद्धा, लाफिंग बुद्धा के तमाम प्रतीक. इन्ही में अपने गणेश लक्ष्मी और हनुमान. प्लास्टिक के इन पौधों को देखकर लगा कि क्या भविष्य इन्ही सबका है. आने वाली पीढियां असली पेड़-पौधों और जानवरों को देखने को तरस जाएँगी क्या.
हे भगवन ऐसा न हो वरना गजब हो जायेगा. खैर मैंने जोर से अपना सिर झटका और इस मायाजाल से बाहर निकला. अगल बगल दूकाने सजी हुई थी. फूटपाथ पर रोज़मर्रा के सामान से लेकर उपहार में देने लायक गिफ्ट्स मिल रहे थे. लेकिन लगेज भारी होने के डर से कोई सामान लेने की हिम्मत न हुई.
हे भगवन ऐसा न हो वरना गजब हो जायेगा. खैर मैंने जोर से अपना सिर झटका और इस मायाजाल से बाहर निकला. अगल बगल दूकाने सजी हुई थी. फूटपाथ पर रोज़मर्रा के सामान से लेकर उपहार में देने लायक गिफ्ट्स मिल रहे थे. लेकिन लगेज भारी होने के डर से कोई सामान लेने की हिम्मत न हुई.
शहर का सौंदर्यीकरण अभी भी जारी है। फुटपाथों को हरा भरा बनाया जा चुका है। जगह-जगह दुर्गा पूजा पंडाल के ढांचे खड़े हो चुके हैं बाजार में पूजा सेल लग चुकी है पर अभी भीड़ उतनी नही है जल्दी ही लोगबाग पूजा की खरीददारी को निकलेंगे तब चारों तरफ सिर्फ सिर ही सिर दिखेंगे। बंगाली दुर्गा पूजा बड़े उत्साह से मनाते हैं. उनके लिए दुर्गा पूजा मतलब आनंद, उत्सव, नाचगान और खानपान. इससे कम कुछ नहीं. इसके ठीक बाद आपको पूरे भारत में बंगाली घुमते हुए नज़र आयेंगे क्योकि ब्नागल में पूजा की लम्बी छुट्टियाँ होती हैं और वे निकल लेते हैं टूर पर. दूकानों की खरीदारी धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है. जब उत्तर भारत पित्र पक्ष में तर्पण कर रहा होता है तब बंगाल पूजा की खरीददारी में दुकानदार को दाम अर्पण कर रहा होता है। और हां भाजपा समर्थकों के लिए खुशखबरी है कि आम जन से बात करने पर पता चला कि इस बार स्थिति मजबूत है और दीदी को कठिन चुनौती मिलने वाली है। आमजन इसबार भाजपा के बारे में बात करता हुआ नज़र आ रहा है.
ये है कोलकाता की प्रसिद्द मिठाई की दूकान जिसका मुख्यालय भवानीपुर में है यह करीब 125 साल से भी ज्यादा पुराणी दुकान है. इनके यहाँ रोस्टेड दही, रोस्टेड गुलाब जामुन जामुन जैसी नायब मिठाइयाँ खाने के लिए मिलती हैं. कोलकाता में इसकी कई शाखाएं हैं. इस दूकान में नेताओं के नाम के भी सोंदेश मिलते हैं. मैंने तो रोज़ सन्देश लिए वैसे मुझे रोसोगुल्ला बहुत पसंद है. तमाम तरह की चौकलेट में लिपटी मिठाइयाँ भी हैं जो शेष भारत में आपको नहीं मिलेंगी. वैसे भी खानपान हर शहर का अलग ही है. मलिक मोशाय की दुकान का भ्रमण कीजिये और फिलहाल आनंद लीजिये, मुझे आगे जाना है।
ये है कोलकाता की प्रसिद्द मिठाई की दूकान जिसका मुख्यालय भवानीपुर में है यह करीब 125 साल से भी ज्यादा पुराणी दुकान है. इनके यहाँ रोस्टेड दही, रोस्टेड गुलाब जामुन जामुन जैसी नायब मिठाइयाँ खाने के लिए मिलती हैं. कोलकाता में इसकी कई शाखाएं हैं. इस दूकान में नेताओं के नाम के भी सोंदेश मिलते हैं. मैंने तो रोज़ सन्देश लिए वैसे मुझे रोसोगुल्ला बहुत पसंद है. तमाम तरह की चौकलेट में लिपटी मिठाइयाँ भी हैं जो शेष भारत में आपको नहीं मिलेंगी. वैसे भी खानपान हर शहर का अलग ही है. मलिक मोशाय की दुकान का भ्रमण कीजिये और फिलहाल आनंद लीजिये, मुझे आगे जाना है।






1 comment:
Thanks a lot...
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