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Monday, December 24, 2012

कराहटों पर भी राजनीति



किसी ने कहा कि हम उसे नौकरी देंगे, कोई बोला कि इलाज के लिए विदेश भेजा जायेगा, कोई सदन में रोया तो किसी ने सदन में ही किसी को धक्का दे दिया, लेकिन किसी ने ये नहीं कहा कि यदि वो लड़की बच गई तो हम अपने लड़के की शादी उससे करा देंगे या अपनी अकूत सम्पदा का एक बड़ा हिस्सा उसके नाम कर देंगे और वो शान से अपनी ज़िंदगी सर ऊंचा करके जियेगी. ऐसा हौंसला न तो किसी ने बाहर दिखाया न ही सदन के अंदर. इसी बीच और लोग भी सक्रिय हो गए कुछ एक्चुअल वर्ल्ड में और कुछ वर्चुअल वर्ल्ड में. किसी ने उस लड़की के बारे में बैनर पोस्टर हाथों में उठाये, खबरनवीस आये कैमरों की बत्ती चमकी, फोटो खिंची, लोगों ने नारे लगाये और अगले दिन अखबार में छप भी गई, लोगों ने एक दूसरे को बधाई दी, कुछ इसी तरह कोई सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपनी वॉल पर कुछ मार्मिक सा लिख के लोगों कि प्रतिक्रियाएं जानकर खुश हुआ कि अब उसके भी विचारों को समाज में मान्यता प्राप्त है. सब कुछ इसी तरह चल रहा है और वो लड़की ज़िंदगी और मौत के बीच झूलती रही है. किसी ने उसके दर्द को महसूस करने की कोशिश ही नहीं की. लोगों ने अखबार उठाये, लेकिन शेयर की ख़बरों के साथ-साथ यह जानने के लिए कि वो लड़की मरी या ज़िंदा है. बलात्कार पर सख्त कानून बनाने की मांग सबने की लेकिन चर्चा फिर भी यही रही कि लोकसभा का चुनाव मोदी कहाँ से लड़ेंगे और प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं. अगर मस्जिद के बदले मंदिर तो किसी ने बलात्कारियों के घर क्यों नहीं ढहा दिए, लोगों को कानून का डर है या और कुछ, अगर कानून का ही डर है तो बलात्कार क्यों. थोड़े दिन इस मुद्दे पर चर्चा परिचर्चा होती रहेगी, इसके बाद फिर वही ढाक के तीन पात. भारत के हर गाँव में बलात्कार की घटना आम है उस पर कोई इतना संवेदनशील क्यों नहीं होता है, शायद वे साधारण से गाँव दिल्ली नहीं हैं. जहाँ कभी खाप फैसला सुनाती है और कभी कोई और राह चलता, लेकिन मामला जब राष्ट्रीय राजधानी का हो तो राजनीति तो बनती है भाई.

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