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Sunday, February 13, 2011

वो युनिवेर्सिटी के दिन भी बड़े हसीन थे।



वो युनिवेर्सिटी के दिन भी बड़े हसीन थे।
 पहले ही दिन से नेता टाइप बन कर जाना,
बिना जान पहचान वाले नेताओं से भी "भैया" प्रणाम कहना,
दूसरे नए लड़कों का मेरी और आश्चर्य से देखना और मन ही मन खुद का खुश होना,
 एस.पी.मिश्र जी की क्लास में रेलवे स्टेशन की हिंदी पीछे बैठकर पूछना,
 और कामना माम की क्लास में हम पांच लोगों का पञ्च पांडव कहलाना,
 लड़किओं की सीट के बीचोबीच खुद की सीट का रिज़र्व करवाना,
 और अटेंडेंस शीट से लाल वाली और पीली वाली का नाम पता लगाना,
 टैगोर लाइब्ररी के बाहर लॉन में बैठकर आती जाती लड़किओं को निहारना,
 चटनी के साथ में साइंस कैंटीन के समोसे मंगवा के खाना,

 वो बमों के धमाके गोलियों की आवाजें और हम लोगों का दायें बाएं भागना,
 और थोड़ी देर बाद सब कुछ सामान्य हो जाना,
 फिर किसी नेता के लिए लड़कों का जिंदाबाद जिंदाबाद चिल्लाना,
 और हम लोगों का लड़ाई हो गयी लड़ाई हो गयी कह के भागना,
 लड़कियों के सामने नेताओं से अपने संबंधों को बढ़ा चढ़ा के बताना,
 और अपने ही निशान लगाये हुए सवालों को टीचर के निशान बता कर बांटना,
 मेरी लिखी हुई अ कॉपी का क्लास रूम में बंट जाना
और परीक्षा ख़त्म होने पे खड़े हो के कॉपी वापस माँगना,
नेताओं से नक़ल के बदले मनचाहा काम करवाना,
और उनका मुझे छोटू भाई कह कर पुकारना,
चाहे कुलपति का ऑफिस हो या डीन का ऑफिस सब कहीं अपनी दादागिरी चलाना,
और ख़ास कर लड़किओं के सामने लाइन तोड़कर अपना काम करवाना,
फिर किसी विजेता की तरह ऐंठे ऐंठे उनके सामने से निकल जाना.
कुत्ते के पिल्ले को देने के बहाने डीन के बाबु से सरे काम करवाना,
और आज की तारीख तक उसका मुझसे कुत्ता माँगना,
अपनी फीस माफ़ी के साथ साथ दोस्तों की फीस माफ़ करवाना
और फिर क्लास में हीरो बन जाना,

हाथ देखने के बहाने लड़किओं का पकड़ना और उलूल जुलूल उन्हें बताना,
आगे बढ़ बढ़ के लड़किओं का हाथ दिखाना.
और पीछे बैठे लड़कों की लाल लाल आँखें देख मन मन मुस्कुराना।
एक्साम के दिनों में लड़की को गणित के सवाल बताना और खुद के ही नंबर कम आना।
एक बारगी तो कला प्रतिनिधि का चुनाव लड़ने का मन बनाना और सबको चाय पिलाना.
नुक्सान होता देख किसी और को समर्थन देकर उसी की चाय पीना और अपनी जेब बचाना.
चुनाव वाले दिन सर पे बैनर बांधकर विश्वविद्यालय मार्ग पे गुंडों की तरह टहलना,
और सबके तम्बू में घुस घुस कर पूरी सब्जी खाना,
सुबह क्लासेस और शाम को फील्ड पे फूटबाल खेलना,
पुष्कर सर का मुझे लगातार गरियाना,
और थापा की पीठ पे मेरा वो घूँसा मारना,
पसीने से तर बतर हो घर साइकिल से वापस आना,
और घर पे माँ के हाथो से ठंडा पानी पीना,

एक दिन तो हॉस्टल में हादसे के ठीक करीब से निकल जाना..........
हुआ यूँ की नेता जी ने बुलाया था की एल. बी. एस. आ जाओ तो हम और हमारे मित्र भारती जी पहुँच गए अपनी स्कूटर से सुबह सुबह, वहां जाते ही भारती जी धम्म से नेता जी के तखत पे बैठ गए की तभी नेता जी बहुत जोर से चिल्लाये की अबे हटो अबे हटो और उन्होंने भारती जी को धक्का दे के हटाया और अपना गद्दा पलट दिया .हम लोग आश्चर्य चकित हो गए देखा की वहां पे दो कट्टे वो भी लोडेड और जाग्रत अवस्था में दगने को तैयार थे....भारती जी को काटो तो खून नहीं ..हमारा हलक सूख गया...हमारी ऐसी अवस्था देख नेता जी ने हमे पानी पिलाया...थोड़ी देर बाद हमारी जान में जान आई..................खैर

पैसे बचाने के चक्कर में युनिवेर्सिटी से पैदल घर वापस आना,
और रास्ते में सब पैसों की चाय पी जाना,
हजरतगंज में हमारा नेता जी नेता जी खेलना और फिर खुद पर ही हँसना,
खुशबूदार लड़किओं को देखकर पैर से सर तक देखना और फिर ठंडी आंहे भरना,
हम, श्रीवास्तव जी, भारती जी, और विशु संग आनंद जी का उछल कूद गंज में मचाना,
और सभी गंज के घूमने वालों का ध्यान अपनी ओर खींचना,
फिर बारी आई एम्.ए. की तो सोल्वर के रूप में श्रीवास्तव जी और भारती जी को बिठाना,
फिर भी मेरा एडमिशन एम्. ए. में न होना,
होते करते भारती जी पुनः हनुमान बन के आये
और दोबारा फॉर्म भरकर हम भी अपना एडमिशन करवा पाए,
 फिर वही नेतागिरी फिर वही दादागिरी फिर वही लोगों से मेल मिलाप,
वही मुहब्बत के तराने और अशोक वाटिका में प्रेम के अफसाने,

भले ही हम मुहब्बत न करने वालों के कायल थे,
लेकिन हम भी अपनी ............राधा से ही घायल थे,
भारती  जी के संग हमारी "उनको" मिस फ्रेशर का ख़िताब मिलना,
मन  मसोस कर अपने टूटे दिल को कोने में सिलना,
सिला  हुआ दिल उन्हें निगाहें नीची कर चुपचाप दिखाना,
फिर भी उन्हें हमारी मुहब्बत की गहराई का समझ ना आना,
हमें भी यूथ पर्लियामेंट में राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार दो बार मिलना,
समाज कार्य विभाग की बस से दिल्ली तक हल्ला करते हुए हमारा जाना,
और  रास्ते में रुक रुक कर हैण्ड पाइप के पानी से नहाना,
गुरुजनों की नक़ल करना और उनके तरह तरह के नाम धरने में हम मास्टर थे,
नेताओं के भाषणों के भी हम ही क्राफ्टर थे,


पहले एम्.ए. में हम रंगीन लेकिन दूसरे में संगीन हो गए थे,
जिम्मेदारिओं की चादर ने हमे सर से पाँव तक ढक लिया था,
और हम भी दो जून की रोटी में तल्लीन हो गए थे....................................
वो युनिवेर्सिटी के दिन भी बड़े हसीन थे।
वो युनिवेर्सिटी के दिन भी बड़े हसीन थे।

8 comments:

Bhawna Tewari said...

sir bhut salar shbdon mein dil ko ttol dala aapne...

Diary said...

haha....sir ji poori zindagi dikha di apni.....bhut badhiya

Unknown said...

sir it is a great poem about ur college life.
This one is so special because i think it has covered almost each and every aspect of college life...really true..I am also missing my college days a lot.....I WISH IF I COULD TURN BACK Time......and I am sure sirf mujhe hi nahi jisne bhi aapke is blog ko padha hoga usse apni college life jarur yaad aa gayi hogi.

आशीष said...

बहुत सुन्दर रचना सर ....पढते हुए मजा आया.मै खुद कविता को जीने लगा था...बहुत सुन्दर...

Rohit Misra said...

भावना, शुभी, रिशु और आशीष आप लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद् जो आपने मेरी ज़िन्दगी के कुछ अनछुए पहलुओं को देखने में अपना कीमती वक़्त दिया.

umesh singh said...

sir ap ke blog ko maine pana . es ko read karne pe mai apne bite university kabita din yad aya hai .ysha blog likhne ke liy to much tank to you sie .(ap ke disa nirdesh pe chalne wala ap ka student umesh kumar singh )

Ashu chaudhary said...

nice yaaden....

Rohit Misra said...

उमेश मेरे नहीं माता पिता के कदमो पे चलो...मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है....आशु आपका धन्यवाद.