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Wednesday, August 11, 2010

पाँव के छाले

बरसात की भीगी रातों में फिर कोई कहानी याद आयी,
कुछ अपना ज़माना याद आया कुछ उनकी जवानी याद आयी,
कलिओं की तरह जो चिटकी थी उन गुलशन गुलशन होठों पर,
लो बैठे बिठाये आज हमे वो बात पुरानी याद आई,
हम भूल चुके थे किसने हमे दुनिया में अकेला छोड़ दिया,
जब गौर किया तो एक सूरत जानी पहचानी याद आयी,
कुछ पाँवके छाले कुछ आँसू तन्हाई कुछ दर्दे सफ़र,
उस बिछड़े हुए हमराही की एक एक निशानी याद आई.......





3 comments:

brijdotcom said...

थोड़ी बहुत कविता हम भी कर लेते हैं.........

अमीरों की ज़िन्दगी बिस्कुट और केक पर

ड्राईवर की ज़िंदगी स्टीरिंग और ब्रेक पर

अच्छी है ना

Mukul said...

बहुत खूब रोहित तुम्हारी इस कविता से मुझे हम लोगों के उन दिनों की याद ताज़ा कर डी जब हम लोगों की दोस्ती की शुरुवात हुई थी

Rohit Misra said...

thanks to u sir ji