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Wednesday, March 24, 2010

सुप्रीम कोर्ट और राधा कृष्ण

आज मैंने सुबह सुबह दैनिक जागरण समाचार पत्र पढ़ा जिसमे मुख्य पेज और पेज संख्या १९ पर समाचार छपा है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कल कहा की हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार राधा और कृष्ण बिना शादी किये एक साथ रहते थे तो बिना शादी किये विपरीत लिंगी दो लोग एक साथ रह सकते हैं और यौन सम्बन्ध बना सकते हैं , उसका यह बयां दक्षिण भारत की फिल्म अभिनेत्री खुशबु के एक साक्षात्कार में कही गयी एक बात कि विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध जायज़ हैं , के विरुद्ध दाखिल कि गयी एक जन हित याचिका के सन्दर्भ में आया है , हालाँकि कोर्ट ने अपना निर्णय सुरक्षित रखा हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय से इस प्रकार के गैर जिम्मेदाराना बयां कि अपेक्षा नहीं कि जा सकती है, क्यूंकि किसी भी हिन्दू कथा में राधा कृष्ण के यौन संबंधों कि बात नहीं कि गयी है , कोर्ट को छानबीन करनी चाहिए, फिर यदि राधा कृष्ण के सम्बन्ध का संज्ञान कोर्ट लेता है तो इसका मतलब सीता कि अग्नि परीक्षा भी सही है , रावण द्वारा सीता हरण भी सही है , द्रौपदी का चीर हरण भी सही है और अयोध्या में राम मंदिर था ये भी सही है। dashrath ka का तीन रानिओं से शादी करना भी ठीक है तो हिन्दू बहुपत्नी विवाह पर रोक क्यों है , कृष्ण की १६००० हज़ार raniyan थी वो भी ठीक है, और यदि यह सब सही है तो महिलाओं के साथ बलात्कार भी ठीक है क्यूंकि हिन्दू कथाओं में तो महिलाओं के साथ ज़बरदस्ती होती ही रहती थी....... honble सर्वोच्च न्यायालय किन किन baato को सही बताएगा......राधा और कृष्ण ७० करोड़ हिन्दुओं कि आस्था है, प्रजातंत्र में किसी की भी किसी भी प्रकार की भावनाओं को चोट नहीं पहुचाई जा सकती फिर चोट पहुचाने वाला देश का सर्वोच्च न्यायालय ही क्यों न हो, यह ताना शाही है। कहा जाता है की प्रजातंत्र में कोर्ट जनताके अधिकारों का रक्षक होता है आज मुझे दुःख हुआ की देश का सर्वोच्च न्यायालय ऐसी बात कहता है। मेरी कोर्ट से विनम्र प्रार्थना है की ये सब बयान देने से पहले ७० करोड़ बार सोचे क्यूंकि इस प्रकार के बयान से मैं बहुत ही ज्यादा आहत हुआ हूँ... और मैं आजाद भारत का आजाद नागरिक हूँ , और मेरी भावनाओं को चोट पहुचाने का अधिकार किसी के भी पास नहीं है......

4 comments:

नीरज दीवान said...

बेहतरीन पक्ष रखा आपने.. कोर्ट की अवमानना का कोई ख़्याल रखना अब बेवकूफी लगती है। कोर्ट ने नहीं रखा तो हम क्यों रखें।

मुझे लिव-इन वगैरह से कोई लेना नहीं। राधा-कृष्ण थे भी या नहीं इससे भी कोई वास्ता नहीं।

मुझे आपत्ति इस बात से है कि एक तरफ कोर्ट मिथालाजिकल करक्टर के आसरे लिन इन को जायज ठहरा रहा है तो दूसरी तरफ रामसेतू के मामले में राम के अस्तित्व को मिथालाजिकल बताते हुए हिस्टोरिकल फैक्ट्स मांगता है। यह दोहरा मापदंड है।

यहां यह भी सोचने वाली बात है कि कोर्ट सनातन धर्म से जुड़े तथ्य छेड़कर भावनाओं पर कुठाराघात करने का दुस्साहस करता है। अन्य धर्मों पर मौन क्यों रहता है?

Unknown said...

this is a important issue related to the importance of the institution called MARRIAGE. if this acceptable then what is the need of marriage. and above all being a woman i would like to raise a question on a woman's dignity too.
did the society give the same honor and regard to this arrangement as it use to give to the marriage.
actually this type of decisions are meagerly applied to handful urbanites then to the aam janta of hindustan.

Unknown said...

You are absolutely right sir.

Supreme court ko koi right nahi ki wo hamari Dharmik bhawnao ko hurt kare. And Live-in-relationship ka favour karne se pehle ye b soch lena chahiye ki agar Vivah naam ki sanstha khatam ho gayi to Parivar naam ki sanstha b khatam hone ki kagar par aa jayegi aur iska society par kitna kharab effect padega iska andaza bhi nahi lagaya ja sakta.kyunki kayi tarah ke control jo hum sabke liye bahut jaruri hai wo sab b khatam ho jayenge.


And I don't care about others' favour for Live-In-Relationship, because I think that this type of relationship is also a kind of prostitution for male and female both.
And if this kind of relationship can be acceptable then prostitutes also should be given same rights & respect , which have been given to those people who are in Live-in-relationship.

brijdotcom said...

हिन्दुओं की भावनाओं को मत भड़काओ

वैसे कोई फर्क नहीं पडेगा

हम सो रहे हैं

do not disturb